आइसलैंड के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित रेयकनेस पेनिनसुला क्षेत्र में यह ज्वालामुखी 600 वर्षों से शांत था। लेकिन हाल ही में भूगर्भीय हलचलों के बाद यह फट पड़ा। ईएसए के वोल्केनोलॉजिस्ट डॉ. फ्रेडरिक लेर्सन का कहना है कि इस विस्फोट का पैटर्न 1783 के ‘लाकी इरप्शन’ से मिलता है, जिसने यूरोप समेत उत्तरी गोलार्ध में तापमान गिराकर फसलें बर्बाद कर दी थीं। यह घटना जलवायु पर दीर्घकालिक असर डाल सकती है।
आइसलैंड में 600 साल के सन्नाटे के बाद एक विशाल ज्वालामुखी का फटना सिर्फ स्थानीय संकट नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु और पर्यावरण संतुलन के लिए खतरे की बड़ी चेतावनी है। जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन और यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के विशेषज्ञों ने इसे धरती के भीतर बढ़ते तनाव का अलार्म बताया है। वायुमंडलीय वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे निकलने वाली राख और गैसें ग्लोबल कूलिंग की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकती हैं।
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आइसलैंड के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित रेयकनेस पेनिनसुला क्षेत्र में यह ज्वालामुखी 600 वर्षों से शांत था। लेकिन हाल ही में भूगर्भीय हलचलों के बाद यह फट पड़ा। आइसलैंडिक मेट्रोलॉजिकल ऑफिस (आईएमओ) ने पुष्टि की है कि 3 अगस्त को स्थानीय समयानुसार रात 11 बजे लावा का विस्फोट शुरू हुआ, जिसने आसपास के क्षेत्रों में आपातकालीन अलर्ट जारी कर दिया है। यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ईएस ए) की सैटेलाइट मॉनिटरिंग से बीते कुछ हफ्तों में धरती की सतह में असामान्य उभार और गैस उत्सर्जन दर्ज किया गया था। ईएसए के वोल्केनोलॉजिस्ट डॉ. फ्रेडरिक लेर्सन ने द गार्जियन को बताया कि इस विस्फोट का पैटर्न 1783 के ‘लाकी इरप्शन’ से मिलता है, जिसने यूरोप समेत उत्तरी गोलार्ध में तापमान गिराकर फसलें बर्बाद कर दी थीं। यह घटना जलवायु पर दीर्घकालिक असर डाल सकती है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह सिर्फ आइसलैंड की नहीं, पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है।
अमेरिका और यूरोप भी सतर्क
आइसलैंड की सरकार ने प्रभावित इलाकों में तुरंत आपातकालीन निकासी अभियान शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री कैटरिन जैकब्सडॉटिर ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चेतावनी देते हुए कहा है, यह एक लोकल आपदा नहीं है, इसकी राख और सल्फर डाइऑक्साइड हवाओं के जरिए यूरोप, अमेरिका और एशिया तक असर डाल सकती हैं। हवाई यातायात पर भी गंभीर खतरा है। अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे ने इसे हाई इंपैक्ट इरप्शन इवेंट दिया है। यानी ऐसा ज्वालामुखी विस्फोट, जिसका असर वैश्विक स्तर पर हो, जैसे तापमान में गिरावट, कृषि उत्पादन पर असर और जलवायु में अस्थायी या दीर्घकालिक परिवर्तन।
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भविष्य के खतरे
वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि यह विस्फोट लंबे समय तक जारी रहा तो वैश्विक तापमान में 0.3 से 0.5 डिग्री सेल्सियस की गिरावट संभव है, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। नेचर जिओ साइंस पत्रिका ने चेतावनी दी है कि इससे उत्पन्न सल्फेट एरोसोल्स मानसूनी चक्रवातों की दिशा और तीव्रता को भी बदल सकते हैं। आइसलैंड में फटे इस ज्वालामुखी ने दुनिया को एक बार फिर याद दिला दिया है कि धरती के भीतर की ‘लावा-घड़ी’ लगातार टिक-टिक कर रही है।वैज्ञानिकों के अनुसार यह घटना एक बड़ी श्रृंखला का संकेत हो सकती है, जिसे रोकना मानव के बस में नहीं लेकिन इसके असर को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर तैयार रहना अनिवार्य है।