शीन: मेरे पापा इकलौते नहीं थे, जिनके शब्दकोश में डर नाम का शब्द नहीं था। हमारा देश महान है। लाखों लोग देश के लिए जान देने को तैयार रहते हैं। सवाल शासन-प्रशासन के रवैये का है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद अब तक दस सरपंचों की हत्या हो चुकी है। शासन उनकी भी रक्षा नहीं कर पा रहा। सुरक्षा देने की बात तो छोड़िए, गृहमंत्री अमित शाह ने सरपंचों को महज दो लाख रुपये का बीमा कवर देने का वादा भी नहीं निभाया।
मतलब कश्मीरी पंडितों की घर वापसी बेहद मुश्किल है?
शीन: यह सवाल सरकारों से पूछना चाहिए। पापा ने घाटी लौटने के लिए अनुच्छेद 370 के खात्मे का इंतजार नहीं किया। वह दोनों समुदायों में लोकप्रिय थे। घाटी के एकमात्र निर्वाचित हिंदू सरपंच थे। सरकार ऐसे व्यक्ति की भी रक्षा नहीं कर पाई। बार-बार सुरक्षा मांगने के बावजूद सुरक्षा नहीं दी गई। जिन आतंकियों ने उन्हें मारा वह सीना ठोककर कह रहा है कि हां, मैंने मारा। जब ऐसी स्थिति हो तो आप समझ सकते हैं कि इस सवाल का क्या जवाब होगा।
शीना: मैं निडर बाप की निडर बेटी हूं। हो सकता है मेरा हश्र भी पापा की तरह हो, मगर डरूंगी नहीं। कश्मीर भारत का है। मेरे पिता का भी है। मेरी तरह सोच रखने वालों की कमी नहीं है। मगर सवाल है कि क्या सरकार जमीनी स्तर पर बदलाव लाने की कोशिश करेगी?
कश्मीर का क्या भविष्य देखती हैं?
शीन: कश्मीर भारत का ही रहेगा। जरूरत ऐसी सोच-समझ रखने वालों को हौसला देने की है। मगर यह कौन करेगा? शासन-प्रशासन का रवैया अलगाववादियों की रणनीति को अमली जामा पहनाने वाला है। अभी बीबीए कर रही हूं। पापा का सपना पूरा करने की जिम्मेदारी है। मैं जन्मभूमि जाऊंगी। पापा मुझे आईएएस बनाना चाहते थे। मुझे नहीं पता आगे क्या राह होगी, मगर मैं देश की सेवा करूंगी, इसका जरिया कुछ भी हो।