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‘मैं अपना त्यागपत्र देने जा रहा हूं’

Sat, 18 Aug 2018 01:30 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Atal Bihari Vajpayee
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अध्यक्ष महोदय, संसद में मैंने चालीस साल गुजारे हैं। ऐसे क्षण बार-बार आए हैं। सरकारें बनी हैं, बदली हैं, नई सरकारों का गठन हुआ है, लेकिन हर कठिन परिस्थिति में से भारत का लोकतंत्र बलशाली होकर निकला है और मुझे विश्वास है कि इस परीक्षा में से भी बलशाली होकर निकलेगा। मराठी में एक कहावत है, 'निन्दकाचे घर असावे शेजारी' अर्थात निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय। निंदा करने वाले पास में रखना चाहिए, नहीं तो चापलूस बिगाड़ देंगे। अगर निंदक रहेगा, तो बिना साबुन और पानी के सफाई करता रहेगा।
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मैं अपने प्रिय मित्र श्री मुरासोली मारन के प्रति विशेष कृतज्ञता व्यक्त करना चाहता हूं। यद्यपि बहुत से मसलों पर हम एक-दूसरे से भिन्न मत रखते हैं, फिर भी प्रलोभन देकर सांसदों को तोड़ने के मामले में उन्होंने यह कहकर सत्यापित कर दिया है कि हम लोगों ने अल्पमत को बहुमत में बदलने के लिए सूटकेसों का इस्तेमाल नहीं किया। हमारा हमेशा से यही विचार रहा है कि कमजोर राज्यों के होते हुए केंद्र कभी भी मजबूत नहीं हो सकता।

हमारे द्वारा एक राष्ट्र, एक संस्कृति और एक समाज के समर्थन से मारन विक्षुब्ध हैं। मुझे खुशी है कि वह हमारे एक राष्ट्र वाले दृष्टिकोण में सहभागी हैं, परंतु मैं यह कहना चाहूंगा कि उन्होंने एक संस्कृति और एक समाज के बारे में हमारे प्रतिपादन को गलत समझा है। यहां पर जोर देकर मैं कहना चाहूंगा कि भारतीय जनता पार्टी एकरूपता की कतई समर्थक नहीं है। हम यशस्वी प्रख्यात भारत के बहुधार्मिक, बहुभाषी और बहुजातीय स्वरूप को पहचानते व मानते हैं।
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अध्यक्ष महोदय, मुझ पर आरोप लगाया गया है कि मुझे सत्ता का लोभ हो गया है और मैंने पिछले दस दिन में जो किया है, वह सत्ता के लोभ के कारण किया है। अभी थोड़ी देर पहले मैंने उल्लेख किया था कि मैं चालीस साल से इस सदन का सदस्य हूं। सदस्यों ने मेरा व्यवहार देखा है, मेरा आचरण देखा है। जनता दल के मित्रों के साथ मैं सत्ता में भी रहा हूं। कभी हम सत्ता के लोभ से गलत काम करने के लिए तैयार नहीं हुए। लेकिन पार्टी तोड़कर सत्ता के लिए नया गठबंधन करके अगर सत्ता हाथ में आती है, तो मैं ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा। भगवान राम ने कहा था, मैं मृत्यु से नहीं डरता। अगर डरता हूं, तो बदनामी से डरता हूं, लोकापवाद से डरता हूं।

चालीस साल का मेरा राजनीतिक जीवन खुली किताब है। लेकिन जनता ने जब भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़े दल के रूप में समर्थन दिया, तो क्या जनता की अवज्ञा होनी चाहिए? अध्यक्ष महोदय, जब एक बार 31 तारीख शक्ति परीक्षण के लिए तय हो गई, तो सदन की बैठक बुलाना जरूरी था। सदन की बैठक में राष्ट्रपति का अभिभाषण जरूरी था। हम तो कई और भी काम रख सकते थे। कम से कम राष्ट्रपति को उनके अभिभाषण के लिए धन्यवाद देने का काम तो कर ही सकते थे, लेकिन आपने ऐसा नहीं होने दिया, और मैंने भी, संदेह पैदा न हो, इसलिए इस बात पर जोर नहीं दिया। जल्दी से जल्दी पहला अवसर तय किया और इसलिए 27 तारीख और 28 तारीख को रखा। आज फैसला होने जा रहा है। हम बल दे सकते थे कि हमें 31 तक का समय दिया गया है, हम कुर्सी पर बैठे रहेंगे।

अध्यक्ष महोदय, कमर के नीचे वार नहीं होना चाहिए। नीयत पर शक नहीं होना चाहिए। मैंने यह खेल नहीं किया है। मैं आगे भी नहीं करूंगा। हिटलर का हौआ खड़ा किया जा रहा है। इस सदन में, फासिस्टवाद पैदा हो रहा है, यह डर दिखाया जा रहा है। राष्ट्रपति महोदय के अभिभाषण में राम-मंदिर की चर्चा नहीं है, अनुच्छेद-370 का उल्लेख नहीं है, शादी-ब्याह के संबंध में समान कानून बनाने का कोई जिक्र नहीं है। आपने तो स्वदेशी का भी परित्याग कर दिया है। 

ये सारी बातें इस तरह से कही गईं जैसे कहने वाले हमारे इस दृष्टिकोण से बड़े दुखी हैं, जबकि वे इन सब बातों की सदा आलोचना करते रहे हैं। हम तो बहुमत चाहते थे, लेकिन बहुमत हमें नहीं मिला। अब जबकि हम सबसे बड़े दल के रूप में उभरे हैं, तो हमारा प्रयास है कि आम सहमति से कोई चीज बने, कोई चीज चले और इसलिए हमने विवाद की बातों का उल्लेख नहीं किया। इस पर आपको आपत्ति क्या है?

अभी संयुक्त मोर्चा बनने जा रहा है, बन गया है, तो अच्छी बात है। जब संयुक्त मोर्चा बनता है, तो अनेक दल निकट आते हैं। जब अनेक दल निकट आते हैं, तो हरेक को कुछ न कुछ चीजें छोड़नी पड़ती हैं। जनादेश कांग्रेस के खिलाफ है। कांग्रेस की संख्या आधी रह गई है। अलग-अलग क्षेत्रों में, अलग-अलग ढंग से लोगों ने अपनी राय प्रकट की है। अब सब इकट्ठा हो रहे हैं और कांग्रेस का समर्थन प्राप्त कर रहे हैं और कांग्रेस समर्थन देने को तैयार है। अगर यह सामूहिक निर्णय है, तो मुझे कुछ नहीं कहना, लेकिन इस तरह का निर्णय नकारात्मक होगा, इस तरह का निर्णय प्रतिक्रियात्मक होगा, इस तरह का निर्णय केवल हमें आने से रोकने के लिए होगा और यह लोकतंत्र को स्वस्थ बनाने वाली परंपरा नहीं डालेगा।

अध्यक्ष महोदय, देश में ध्रुवीकरण नहीं होना चाहिए। न सांप्रदायिक आधार पर, न जातीय आधार पर, न राजनीति दो खेमों में बंटनी चाहिए कि जिनमें संवाद न हो, जिनमें चर्चा न हो। देश आज संकटों में घिरा है और ये संकट हमने पैदा नहीं किए हैं। जब कभी आवश्यकता पड़ी, संकटों के निवारण में हमने उस समय की सरकार की मदद की है।

आप सारा देश चलाना चाहते हैं, बड़ी अच्छी बात है। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। हम अपने देश की सेवा के कार्य में जुटे रहेंगे। हम संख्या बल के सामने सिर झुकाते हैं। जो कार्य हमने अपने हाथ में लिया है, जब तक वह राष्ट्रीय उद्देश्य पूरा नहीं कर लेंगे, तब तक विश्राम से नहीं बैठेंगे। अध्यक्ष महोदय, मैं अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति महोदय को देने जा रहा हूं।
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(28 मई, 1996 को प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देने के अवसर पर संसद में दिए गए अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण के अंश)
 
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