एसी, फ्रिज से निकलने वाली और ओजोन परत को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाली हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन गैस के उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कमी आई है। पर्यावरण की दृष्टि से इसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि इसमें कमी का लक्ष्य पांच साल पहले पूरा कर लिया गया है।
जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज प्रकाशित शोध के अनुसार, अनुमान था कि साल 2026 में हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (एचसीएफसी) गैस का उत्सर्जन चरम पर पहुंचने के बाद कमी आने लगेगी, लेकिन इसका उत्सर्जन साल 2021 में चरम पर पहुंच गया था और इसके बाद से इसमें कमी आने लगी है। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के ल्यूक वेस्टर्न और उनके सहयोगियों के अध्ययन में पाया गया है कि हानिकारक ग्रीनहाउस गैस एचसीएफसी को कम करने से जलवायु परिवर्तन को कम करने में मदद मिल सकती है।
उत्तरी गोलार्ध में गिरावट सबसे तेज
शोधकर्ताओं के मुताबिक, उत्तरी गोलार्ध में उत्सर्जन की गिरावट सबसे तेज दर्ज की गई। 2023 में एचसीएफसी से वैश्विक प्रत्यक्ष विकिरण बल घटकर 61.28 मिलीवाट प्रति वर्ग मीटर हो गया, जो 2022 में 61.67 मिलीवाट प्रति वर्ग मीटर से कम है।
2023 में एचसीएफसी का समतुल्य प्रभावी क्लोरीन घटकर 319.33 एक भाग प्रति ट्रिलियन हो गया जो 2022 में 321.35 एक भाग प्रति ट्रिलियन था।
अच्छे भविष्य का संकेत
प्रमुख शोधकर्ता ल्यूक वेस्टर्न का कहना है कि पृथ्वी से निकलने वाले विकिरण की तुलना में पृथ्वी में अधिक विकिरण प्रवेश कर रहा है। इसलिए वायुमंडल गर्म हो रहा है। इसी वजह से जलवायु में परिवर्तन भी हो रहा है। कड़े नियंत्रण लागू करने और ओजोन-अनुकूल विकल्पों को अपनाने को बढ़ावा देने से एचसीएफसी की मात्रा में कमी आ रही है। यह पृथ्वी के लिए पर्यावरण के लिहाज से अच्छे भविष्य का संकेत है।
मील का पत्थर है यह सफलता
एचसीएफसी उत्सर्जन को रोकने में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल जैसे वैश्विक समझौतों की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह उपलब्धि मील का पत्थर है जो जलवायु परिवर्तन और समताप मंडल ओजोन परत के नुकसान को कम करने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के लाभों को प्रदर्शित करती है।