चार साल बाद भारत में 87 करोड लोगों के पास नौकरी या काम होगा। इसके बाद किसी रोजगार में लगे लोगों की तादाद के आधार पर भारत दुनिया में सबसे आगे हो जाएगा। जब कोई देश ऐसे किसी मुकाम पर पहुंचता है तो वह कुछ और पाने की उम्मीद करने लगता है।
इसे 'डेमोग्राफिक डीविडेंड' कहते हैं। यानी विशाल आबादी का लाभ। इसका सीधा अर्थ ये है कि ज्यादातर लोगों के पास रोजगार होगा और अर्थव्यवस्था भी तेजी से आगे बढेगी। फिलहाल उम्मीद और अनुमान तो यही है कि भारत जल्द ही इस मुकाम तक पहुंच जाएगा।
हालांकि एक दूसरा नजरिया भी है। कुछ ही महीने पहले आंकडों पर आधारित पत्रकारिता करने वाले 'इंडियास्पेंड' ने अपनी एक रिपोर्ट में रोजगार के मसले पर छह आकलन सामने रखे थें।
1. साल 2015 में भारत में संगठित क्षेत्र में बहुत कम लोगों को रोजगार मिला। बीते 7 साल से आठ अहम उद्योगों से जुडी बडी कंपनियों और फैक्ट्रियों की यही हालत रही।
2. यह तय है कि साल 2015 में असंगठित क्षेत्र में रोजगार 93 फीसद बढे। असंगठित क्षेत्र में औपचारिक तौर पर न तो हर महीने वेतन मिलता है और न ही सामाजिक सुरक्षा।
3. भारत के गांवों में आय बहुत ही कम हो गई है। खेती की बात करें तो इसमें 47 फीसद आबादी लगी हुई है। जबकि इस क्षेत्र में साल 2014 में 0।2 फीसद की गिरावट रही और साल 2015-16 में महज 1 फीसदी की बढोत्तरी।
4. इनमें से 60 फीसदी लोगों के पास पूरे साल कोई काम नहीं होता है। यह भारत में अस्थाई रोजगार और अंडर इंप्लॉयमेंट के हालात को दिखाता है।
5. भारत में नई कंपनियों की स्थापना की दर गिरकर साल 2009 के स्तर पर आ गई है और मौजूदा कंपनियों का विकास दर पिछले पांच साल के सबसे निचले स्तर पर है।
6. बडे कॉरपोरेशन और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भारी आर्थिक दबाव में हैं। भारत में कंपनियों का औसत आकार लगातार घटता जा रहा है। जबकि इसी माहौल में बेहतर तौर पर संगठित बडी कंपनियां नौकरी दे रही हैं।