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अस्पताल में आपकी जान और पैसा ऐसे बचेगा

Mon, 11 Jul 2016 07:30 PM IST
विनीत खरे/ बीबीसी
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- फोटो : bbc
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ऐसे वक्त जब स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी अस्पतालों का दबदबा है, विशेषज्ञ मांग कर रहे हैं कि सरकार अपना दखल बढ़ाए, स्वास्थ्य बजट में बढ़ोत्तरी हो और इस सेक्टर को रेग्युलेट किया जाए। बीबीसी हिंदी ने लोगों को उचित मूल्य में बेहतर सेवाएं उपलब्ध करवाने के मुद्दे पर वरिष्ठ वकीलों, डॉक्टरों से बात की है। आइए जानते हैं उनका क्या कहना है..
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डॉक्टर-मरीज के बीच भरोसा बढाएं-
कई डॉक्टरों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास में कमी आई है और इस विश्वास को दोबारा स्थापित करने की जरूरत है। कई अस्पतालों के पैनल में रहे एक वकील ने बिना नाम देने की शर्त पर बताया कि डॉक्टर अब खुद को बचाने के लिए मरीज को विभिन्न टेस्ट के लिए बोल देते हैं ताकि बाद में उनकी गर्दन न फंसे, लेकिन इससे मरीज का वक्त, पैसा सब खर्च होता है।

इस विश्वास को दोबारा वापस लाने के लिए जरूरी है कि डॉक्टर और मरीज एक दूसरे के साथ ज्यादा बात करें और मरीज भी ये समझे कि डॉक्टर आखिरकार इंसान है। कई बार मरीज-डॉक्टर फोरम बनाने की भी बात की जाती है। इस फोरम में मरीज डॉक्टरों से अपने सवाल पूछ सकते हैं। अगर वो किसी अन्य डॉक्टर से बीमारी के बारे में दूसरी राय चाहते हैं, तो ये राय उन्हें दी जा सकती है। इससे डॉक्टर और मरीज के बीच रिश्तों में पारदर्शिता आएगी।
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कानून को बेहतर बनाकर, लागू करें

- फोटो : Demo pic
वकील और डॉक्टर एमसी गुप्ता कहते हैं कि अगर वर्ष 2010 क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट ऐक्ट की कमियों को दूर करके इसे लागू किया जाए तो नीमहकीम की समस्या बहुत हद तक खत्म हो जाएगी। इस कानून में अस्पतालों, क्लीनिक के लिए न्यूनतम स्टैंडर्ड सुझाए गए हैं, लेकिन कानून के कुछ पहलुओं पर डॉक्टरों को आपत्ति है।

कुछ एलोपैथी डॉक्टरों की नारजगी आयुर्वेद और होम्योपैथी डॉक्टरों से है और उनका कहना है कि अगर ऐसे डॉक्टरों को एलोपैथी प्रैक्टिस करने की इजाजत दी भी जाती है तो इसके लिए नियम बनाए जाने चाहिए। अस्पतालों के ऊपर लागू होने वाले नियमों में फीस के मानक और पारदर्शिता की बेहद जरूरत है।

निजी मेडिकल कॉलेजों के एडमिशन में पारदर्शिता-
कई डॉक्टरों, वकीलों ने बातचीत में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटों की भारी कमी और निजी मेडिकल कॉलेजों में लाखों, करोडो की फीस पर चिंता जताई। उनका आरोप था नेताओं की मिलीभगत के कारण निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह रहता है और इसमें पारदर्शिता लाए जाने की जरूरत है।

इन संस्थानों में दाखिले के लिए होने वाली परीक्षा भी आईआईटी, या आईआईएम परीक्षाओं की तरह होने चाहिए। साथ ही भारी कैपिटेशन फीस पर रोक लगनी चाहिए। मेडिकल कॉलेज खोलने के मानदंडों में बदलाव लाए जाने चाहिए ताकि नए कॉलेजों को खोलना आसान हो। साथ ही इन कॉलेजों पर बेहतर नियंत्रण की जरूरत है ताकि शिक्षा का स्तर कायम रहे।
 
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मरीजों की प्रतिनिधित्व वाली नई मेडिकल काउंसिल बनें

कई डॉक्टरों की नाराजगी मेडिकल काउंसिल से है। मेडिकल काउंसिल पर पेशे में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर नर्म रवैया अपनाने के आरोप लगते रहे हैं, हालांकि कुछ का ये भी कहना है कि ये आरोप निराधार हैं। एक सुझाव ये भी है कि मेडिकल काउंसिल में मरीजों का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए।

सरकारी अस्पतालों के नेटवर्क को मजबूत करें-
किताब ‘डिसेंटिंग डायग्नोसिस’ में डॉक्टर जॉर्ज मथाई कहते हैं कि ट्रस्ट अस्पताल बनाना सबसे बेहतर मॉडल है ताकि महंगे अस्पताल को बनाने, उसके रखरखाव का खर्च मरीज से न लिया जाए। डॉक्टरों को यहां अटैचमेंट के आधार पर काम करना चाहिए। साथ ही सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च बढाने की जरूरत है। भारत जैसी विशाल जनसंख्या वाले देश में जहां एक बडी संख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारती है, वहां जीडीपी का 1।3 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च पर नाकाफी है।

यूनिवर्सल हेल्थकेयर
दुनिया भर में अगर बेहतर सरकारी स्वास्थ्य सेवा की मिसाल दी जाती है तो ब्रिटेन के एनएचएस का नाम सबसे ऊपर आता है। भारत में भी ऐसी ही स्वास्थ्य सेवा के विकास पर बात होनी चाहिए ताकि सभी को एक तरह की बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पाएं।
 
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