कुछ साल पहले तक लोग यह देखते आए हैं कि राज्यपाल कभी इस तरह से टीवी पर नहीं आते थे। 15 अगस्त या 26 जनवरी पर झंडा फहराते हुए उन्हें देखा जा सकता था। उसके अतिरिक्त वे सार्वजनिक स्थल पर बहुत कम नजर आते थे।
कुलाधिपति होने के कारण वे विश्वविद्यालयों में जाते रहे हैं। बतौर यादव, अब देखिS केरल और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल तो टीवी पर आकर ऐसे विषयों पर बोल रहे हैं जो किसी न किसी रूप में राजनीति से जुड़े रहते हैं।
कोरोना की लड़ाई में जिस तरह से राज्यों की आवाज और भूमिका को दबाने का प्रयास किया गया, उससे सहकारी संघवाद को करारी चोट लगी है। केंद्र सरकार ने कोरोना की आड़ में एक इशारा कर दिया है कि संघवाद अब ज्यादा नहीं चलेगा।
भारतीय संविधान सरकार को एक संघीय प्रणाली के तहत काम करने की शक्तियां और अधिकार प्रदान करता है। इसमें केंद्र और राज्यों के विधायी विषयों के दायरे और सीमाएं स्पष्ट रूप से परिभाषित की गई हैं।
कोरोना के खिलाफ लड़ाई के दौरान केरल और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल तब्लीगी समाज को लेकर केंद्र सरकार के पक्ष में आ गए थे। इन दोनों राज्यपालों ने तब्लीगी समाज पर न केवल खुलकर सार्वजनिक बयानबाजी की, बल्कि टीवी पर भी ये खुलकर बोलते नजर आए।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनकड़ ने ममता बनर्जी को पत्र लिख कहा, दुर्भाग्यवश पश्चिम बंगाल 'पुलिस राज्य' बनता जा रहा है। यहां के लोगों को पता है कि सरकार और सिंडिकेट कौन चलाता है।
इससे पहले राज्यपाल ने दिल्ली में तब्लीगी जमात के एक कार्यक्रम का संदर्भ देते हुए ममता पर अल्पसंख्यक समुदाय के 'खुलेआम तुष्टीकरण' का आरोप लगाया था। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल में अपने अधिकारियों की एक टीम भेजकर वहां कोरोना के मामले पर एक रिपोर्ट तैयार करा दी।
इसे लेकर भी ममता बनर्जी काफी परेशान रही हैं। उन्होंने कहा, ये राज्य सरकार में सीधे तौर पर केंद्र का हस्तक्षेप है। केरल के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान ने भी टीवी पर आकर तब्लीगी समाज को आड़े हाथ लिया था।