श्रीलंका की बदहाल स्थिति भारत सहित दुनिया के दूसरे देशों के लिए अपनी आर्थिक स्थिति परखने का कारण बन गई है। आर्थिक विशेषज्ञों की राय है कि श्रीलंका ने अपने यहां टैक्स दरों में कमी की और गैर-जरूरी योजनाओं में निवेश किया जिससे उसका कर्ज बढ़ता गया और एक दिन उसे डिफाल्टर की श्रेणी में रख दिया गया। दुनिया के कई अन्य देशों के साथ-साथ भारत के अनेक राज्यों की स्थिति भी श्रीलंका की तरह हो चली है, जहां वे लगातार कर्ज के तले दबते चले जा रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी वे गैर-जरूरी लोकलुभावनकारी योजनाओं में निवेश कर रहे हैं। अर्थव्यवस्था के जानकार इसे देश-राज्य की आर्थिक स्थिति के लिए गंभीर चेतावनी बता रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुफ्त की रेवड़ी बांटकर वोट बटोरने वाली बात इसी परिस्थिति से जोड़कर देखी जा रही है। क्या राज्य इन खर्चों से बच सकते हैं?
इस तरह गंभीर हुई समस्या
वर्ष 2020-21 में श्रीलंका का कुल कर्ज 51 बिलियन डॉलर या अपनी जीडीपी का 102.8 प्रतिशत हो चुका था। यह एक मानक होता है जिसे देखकर विदेशी निवेशक किसी देश में निवेश करने का निर्णय लेते हैं। बढ़ते समय के साथ श्रीलंका का यह कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है। बदले में कुछ प्राप्त न होने की आशंका के कारण वहां लंबे समय से कोई निवेश नहीं हो रहा है।
यही कारण है कि श्रीलंका के पास विदेशी मुद्रा की भारी कमी हो गई और वह अपनी आवश्यक चीजों के आयात के लायक धन भी नहीं जुटा पा रहा। अब वह केवल विदेशी सहायता पर निर्भर रह गया है, लेकिन कोरोना के साथ-साथ यूक्रेन-रूस युद्ध और इसके कारण पैदा हो रही रिकॉर्डतोड़ महंगाई ने विदेशों की मदद करने की क्षमता भी कमजोर कर दिया है। ऐसे में श्रीलंका के पास विकल्प बेहद सीमित हो गए हैं।
भारत के राज्यों की गंभीर स्थिति
केंद्रीय बैंक आरबीआई द्वारा एनके सिंह की अगुवाई में गठित एक कमेटी के अनुसार राज्यों का सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में कर्ज 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। लेकिन रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2021-22 में पंजाब का सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) की तुलना में कर्ज 53 प्रतिशत हो चुका था। इसी तरह राजस्थान का कर्ज 39.8 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल का 38.8 प्रतिशत, केरल का 38.3 प्रतिशत और आंध्रप्रदेश का 32.4 प्रतिशत हो गया था। गुजरात जैसे आर्थिक संपन्न राज्यों की स्थिति भी लगातार खराब होती गई है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की नवंबर माह की एक रिपोर्ट के अनुसार, 18 शीर्ष राज्यों का सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में कर्ज 31.2 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र-राज्यों का बाजार से लिया जाने वाला कर्ज 63.6% तक बढ़ चुका है। वर्ष 2021-22 में आंध्रप्रदेश का कुल कर्ज 3.89 लाख करोड़ रूपये हो चुका था।
क्या गरीबों की मदद न करें?
भारत एक गरीब देश है जहां की बड़ी आबादी अपनी भोजन या आवास सुविधा तक के लिए सरकारों पर निर्भर करती है। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए केंद्र सरकारें राशन योजना, आवास योजना और अन्य योजनाएं चलाती रहती हैं। नए समय में कुछ राजनीतिक दलों ने अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त बिजली, टीवी, प्रति माह भत्ता सहित अनेक योजनाओं की शुरूआत की है। इससे राज्यों-केंद्र सरकार पर भार बढ़ा है जो उसके कर्ज को लगातार बढ़ाता जा रहा है। ऐसे में भारत क्या गरीब नागरिकों की मदद करने से पीछे हट सकता है?
क्या करना चाहिए?
केंद्र सरकार के कई महत्त्वपूर्ण विभागों में सचिव रह चुके अजय शंकर ने अमर उजाला को बताया कि सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में कर्ज का बढ़ना सही नहीं है, लेकिन यह उतना भी बुरा नहीं है जितना इसे पेश कर दिया जाता है। पश्चिम के अनेक देशों का सकल घरेलू उत्पाद उनकी कुल उत्पादन क्षमता का दो से तीन गुना (200-300%) तक बढ़ चुका है, लेकिन इसके बाद भी वे लगातार विकास कर रहे हैं। इसका बड़ा कारण है कि इन देशों ने बाजार से कर्ज लेकर इसे उत्पादक कार्यों में लगाया है जिससे उन्हें आय प्राप्त हुई है, जिससे वे इन कर्जों की पूर्ति भी कर रहे हैं। जबकि श्रीलंका की स्थिति इसलिए खराब हुई क्योंकि उसने हंबनटोटा जैसे बंदरगाहों के उस विकास में पैसा खर्च किया जहां से उसे कोई रिटर्न प्राप्त नहीं हुआ।
मूलभूत ढांचे में निवेश किसी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाला सबसे बेहतर कदम माना जाता है। इससे अनेक उद्योंगों में कामकाज बढ़ता है, लोगों को रोजगार प्राप्त होता है और देश की अर्थव्यस्था में मजबूती आती है। यानी सड़कों, हवाई अड्डों, बंदरगाहों और बाजारों का विकास देश की अर्थव्यवस्था के लिए तभी लाभकारी साबित हो सकता है जब यह अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करता हो। लेकिन यदि यही निवेश ऐसी योजनाओं में हो जिससे कोई आय न बढ़े तो यही निवेश देश के लिए भारी संकट का कारण भी बन सकता है।
भारत के पास विकल्प
हमें आवश्यक जरूरतों और अनावश्यक योजनाओं में भेद करना होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसी महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएं हैं जिन्हें किसी भी दृष्टि से गैर-लाभकारी दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। शिक्षित और स्वस्थ नागरिक राष्ट्र के लिए सर्वोत्तम मानव संसाधन साबित होते हैं जिनके दम पर पूरे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का खाका खींचा जा सकता है, इसलिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य को इस नजरिए से नहीं देखना चाहिए। इसी प्रकार क्षमतावान खिलाड़ियों के लिए ट्रेनिंग, प्रतिभावान छात्रों के लिए कोचिंग या नए विचारों से युक्त युवाओं को उद्यमशीलता के लिए आवश्यक मदद उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
केंद्र-राज्यों को इस बात से सावधान रहना चाहिए कि केवल वोट हासिल करने के लिए लोकलुभावनी नीतियां नहीं घोषित की जानी चाहिए। इसे रोकने के लिए आवश्यक कानून बनाकर विभिन्न राज्यों के राजनीतिक दलों में लगी होड़ को समाप्त करना चाहिए। यदि मनरेगा जैसी योजनाएं बनाकर गरीब-रोजगार विहीन नागरिकों को आर्थिक मदद भी उपलब्ध कराई जाए, लेकिन उसके बदले सड़कें, तालाब निर्माण करवाकर इसका उपयोग भी किया जाए तो इससे गरीबों की मदद और लाभप्रद योजनाओं में निवेश साथ-साथ कर देश के विकास को एक नई दिशा दी जा सकती है और कर्ज के जाल में डूबने से बचा जा सकता है।