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'क्रिकेट से रिश्ते पहले सुधरे हैं, जो अब सुधरेंगे?'

Wed, 16 Mar 2016 03:02 PM IST
शशि थरूर/सांसद, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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भारत और पाकिस्तान एक दूसरे के साथ एक बार फिर हिंदुस्तानी सरजमीं पर मैच खेलेंगे - फोटो : BBC
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तो भारत और पाकिस्तान एक दूसरे के साथ एक बार फिर हिंदुस्तानी सरजमीं पर मैच खेलेंगे। इस बार ये मौका होगा वर्ल्ड टी20 क्रिकेट टूर्नामेंट। शनिवार को यह मैच कोलकाता में खेला जाएगा, जिसे धर्मशाला से स्थानांतरित किया गया है क्योंकि हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री को लगा कि उनके राज्य के भारतीय सैनिकों के परिवार 'दुश्मन' के साथ खेल का स्वागत नहीं करेंगे। पाकिस्तानी तो अपनी सुरक्षा के डर से करीब-करीब न आने का मूड बना ही चुके थे। कई विवादों के कारण दोनों देशों के क्रिकेट संबंध अक्सर संकट में घिरे रहते हैं। ऐसे में क्या महज़ एक खेल दोनों देशों को करीब ला सकता है? इस सवाल का जवाब एक लिहाज़ से बहुत आसान है, और वो है 'नहीं'। खेल कई भावनाओं को समेट सकता है, लेकिन यह राजनीति का विकल्प नहीं बन सकता।  क्रिकेट कूटनीति के लिए एक औजार का काम कर सकता है, इसका विकल्प नहीं बन सकता।
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आखिरकार, छह दशकों के क्रिकेट संबंधों ने दो विरोधियों के बीच रिश्ते बेहतर बनाने में बहुत थोड़ी ही मदद की है। अगर खेल किसी बात का शिकार रहा है तो वो है राजनीति। दोनों देशों के बीच क्रिकेट संबंधों में 1960 से 1978 के बीच 18 वर्ष का अंतराल आया था। साल 1987 से 1999 के बीच 12 सालों तक पाकिस्तानी टेस्ट टीम का भारत दौरा लंबित रहा और वर्तमान गतिरोध 2010 में मुंबई हमले और उसके बाद की घटनाओं के बाद पैदा हुआ। सामान्य क्रिकेट संबंधों की बुनियादी चुनौती विभाजन से पैदा हुई मानसिकता भी है। पाकिस्तान में क्रिकेट पर बहुत सारी उम्मीदों का भार लदा होता है। अपने से विशाल (और ताक़तवर) पड़ोसी का सामना, जिससे वो खुद कभी अलग हुआ, राष्ट्रीय स्वाभिमान के मुद्दे से जुड़ जाता है। राष्ट्रवाद की सेवा में क्रिकेट को औजार के रूप में इस्तेमाल करना खासकर, भारत के खिलाफ, यह पाकिस्तानी क्रिकेट की खास बात रही है। 

धार्मिक भावनाओं का मुखर इजहार भी यही है। पाकिस्तान के तत्कालीन कप्तान शोएब मलिक ने 2007 के टी20 वर्ल्ड कप में अपनी टीम का समर्थन करने के लिए सार्वजनिक तौर पर 'पूरी दुनिया के मुसलमानों को शुक्रिया' कहा था। इसके उलट भारत की बहु-धार्मिक, बहु-जातीय और बाजार आधारित क्रिकेट संस्कृति, बहुत हैरान कर देने वाली है। ये वही दो देश हैं जिनके सैनिक एक दूसरे पर बात बात पर फ़ायरिंग कर देते हैं, जहां पूर्व में सरहदी तनाव युद्ध में तब्दील हो चुका है और जहां एक क्रिकेट मैच का नतीजा, सैनिकों में जबरदस्त जश्न का माहौल बना देता है, या फिर नियंत्रण रेखा पर धमकाने के अंदाज में फायरिंग को उकसा देता है। ये वो क्षेत्र है जहां, पाकिस्तान का भारत में चरमपंथ को कथित रूप से बढ़ावा देना और (पाकिस्तानियों की नज़र में) भारत में 'मुसलमानों का दर्द,' दोनों पक्षों को क्रिकेट के मैदान में सबक सिखाने की नैतिक ज‌िम्मेदारी से भर देता है।
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आपसी प्रतिद्वंद्विता को तीखा बनाने के जितने तत्वों का मिश्रण भारत-पाकिस्तान मैच में मौजूद है, उतना दुनिया के किसी अन्य क्रिकेट मैच में नहीं है। इस तरह की पृष्ठभूमि के बरक्श, अगर हम उम्मीद करते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच महज़ एक खेल की घटना बने रहें, तो यह बहुत ज्यादा की उम्मीद करना है। जैसा कि एक्टिविस्ट और दार्शनिक सीएलआर जेम्स ने मशहूर वाक्य लिखा है, "वो क्रिकेट के बारे में क्या जानें, जो केवल क्रिकेट जानते हैं।" दोनों टीमों ने इंग्लैंड में 1999 का वर्ल्ड कप खेला था. उस समय पाकिस्तान की ओर से भड़काया गया कारगिल युद्ध चल रहा था. जिस दिन भारत ने 47 रनों से जीत दर्ज की, ठीक उसी दिन छह पाकिस्तानी सैनिक और तीन भारतीय अधिकारी मारे गए।

और फिर भी, क्रिकेट के मरहम लगाने वाले गुणों के बारे में बड़े बढ़िया बढ़िया तर्क दिए जाते हैं। 2003-04 में भारत ने शांति प्रक्रिया को फिर से शुरू किया। पांच दशक में पहली बार पाकिस्तान ने इस मौके पर हजारों भारतीयों को क्रिकेट वीजा देकर सरहद पार जाने की इजाजत दी। 

आम पाकिस्तानियों ने उनका दिल से स्वागत किया। उन दिनों लाहौर या कराची में भारतीय होने का मतलब था मुफ़्त में सफर, रियायती दरों पर भोजन और खरीदारी और दिल जीत लेने वाला सेवा-सत्कार पाना। उस समय ये भी कहा गया कि बड़ी संख्या में पाकिस्तानी 'ऐसा दिखावा' इसलिए कर रहे हैं कि वो भी भारत में ऐसा ही स्वागत चाहते हैं, हालांकि ये पूरी तरह व्यंग नहीं था। 
लेकिन पांच साल भी नहीं हुआ था कि मुंबई हमले का डर आ धमका।

इसका पहला झटका क्रिकेट को लगा। जनवरी 2009 में भारतीय टीम के पाकिस्तान दौरे को रद्द किए कर दिया गया। हमलों के एक सप्ताह बाद मुंबई में तय चैंपियंस लीग रद्द हुई। सरकारी मंजूरी रद्द होने की घोषणा करते हुए भारत के तत्कालीन खेल मंत्री एमएस गिल ने कहा, "ऐसा नहीं हो सकता कि पाकिस्तान से एक टीम हमारे देश में लोगों को मारने के लिए आए और भारत से एक दूसरी टीम वहां क्रिकेट खेलने जाए।"

वर्ल्ड कप जैसे अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट, एक चैरिटी मैच और 2011 में एकमात्र एकदिवसीय सीरीज़ को छोड़ दें तो तबसे दोनों देशों में बमुश्किल ही कोई मैच हुआ है। पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने भी इसके बाद हुए इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) मैचों में हिस्सा नहीं लिया। साफ तौर पर राजनीति ने दोबारा क्रिकेट को बोल्ड आउट किया। तो इस बात की संभावना कहां बचती है कि क्रिकेट, इन ऐतिहासिक विरोधाभासों के बावजूद दोनों देशों के बीच शांति को बढ़ावा देता है?



कई सालों से युद्ध, उग्रवाद, चरमपंथ की बातें होती रही हैं और यहां तक कि बात परमाणु हथियारों के इस्तेमाल तक पहुंची है। भारतीय नेता लगातार पूछते हैं कि भारत एक ऐसे देश के साथ क्रिकेट कैसे खेल सकता है, जो भारत के ख़िलाफ़ ही चरमपंथ को बढ़ावा देता है। सत्तारूढ़ पार्टी के अधिकांश सांसद और हिंदू कट्टरपंथी पार्टी शिवसेना, पाकिस्तान के साथ किसी भी किस्म के खेल संबंध का विरोध करते हैं। जब रिश्तों में गरमाहट आती है तो इसका साफ असर क्रिकेट पर भी दिखाई देता है। लेकिन एक दिक्कत है, क्रिकेट कूटनीति के पीछे चलेगा न कि इसके आगे। 

2003-04 में आई गर्मजोशी दोनों देशों के बीच रिश्ते में सुधार की वजह से नहीं आई थी, बल्कि यह इसकी छाया थी। और जब दोनों देशों की सरकारों में तनातनी हुई, तो तनाव के बीच भी मैच हुए। उदाहरण के लिए कारगिल के दौरान वर्ल्ड कप। हालांकि इन मैचों को एक छद्म युद्ध की तरह देखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। क्रिकेट एक खेल है, एक क्रिकेट टीम किसी देश का प्रतिनिधित्व करती है।
किसी भी अन्य राष्ट्रीय उद्यम के मुक़ाबले क्रिकेट से और अधिक भार ढोने की उम्मीद करना साफ तौर पर ज़्यादती है। फिर भी क्रिकेट को खास तौर पर पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा निकालने का जरिया बनाया जा रहा है।



हमने इस देश के ख़िलाफ़ प्रतिबंध नहीं लगाए हैं, अपने राजनयिक वापस नहीं बुलाए हैं, उनके साथ व्यापार नहीं बंद किया है या भारत में उनके फ़िल्मी स्टार या गायकों पर प्रतिबंध भी नहीं लगाए हैं।
लेकिन तिरस्कार के लिए अगर कोई अकेली गतिविधि को चुना जा रहा है तो वो है क्रिकेट।  मैं मानता हूँ कि हमें पाकिस्तान को कई अन्य मोर्चों पर बातचीत में शरीक करने की ज़रूरत है. सेना और मुल्लाओं के प्रभाव को संतुलित करने के लिए आम पाकिस्तानियों के साथ 'पीपुल टू पीपुल' संवाद स्थापित किए जाने का मैं बड़ा हिमायती हूँ। दो देशों के बीच रचनात्मक संवाद क़ायम करने में क्रिकेट सबसे बेहतरीन उपाय है. यह दोनों तरफ़ के लोगों में एक दूसरे की प्रतिभा का सम्मान करने में मददगार है न कि एक दूसरे के पूर्वाग्रहों को बढ़ाने में। क्रिकेट आम लोगों में एक व्यापक संदेश देने के लिए नीतियां बनाने वालों का औजार हो सकता है और रहा है।

जब तक भारत और पाकिस्तान के बीच मुद्दे अनसुलझे रहेंगे तब तक क्रिकेट खेल ही है और इसे 'बिना तोपों का युद्ध' न समझें। इसलिए शनिवार को होने वाले क्रिकेट मैच का लुत्फ उठाएं। किसी भी वर्ल्ड कप में भारत पाकिस्तान से नहीं हारा है और पाकिस्तान कभी भी कोलकाता के ईडन गार्डन में भारत से नहीं हारा है। इस या उस तरह, इतिहास तो बनेगा ही और यह इतिहास होगा क्रिकेट का...
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