उन्होंने कहा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में पाठ्यक्रम का वितरण इस प्रकार का है कि अगर बच्चों को कुछ समय के रोक के बाद भी दोबारा शिक्षा जारी की जाए, तो इससे उनके सीखने की क्षमता पर किसी प्रकार का असर नहीं पड़ेगा।
इस दौरान सीमित कक्षाओं और ऑनलाइन पाठ्यक्रम के जरिए बच्चों की निरंतरता बनाए रखने की कोशिश की जा सकती है।
अगर एक तिहाई बच्चों को एक बार में स्कूल में शिक्षा देने का विकल्प अपनाया जाता है, तो इससे बच्चों को तीन शिफ्ट में स्कूल लाना और छोड़ना पड़ेगा। टीचर्स को भी अलग-अलग समय के हिसाब से स्कूल आने-जाने की मजबूरी हो सकती है।
ऐसे में स्कूल बसों का खर्च बढ़ेगा। स्कूल के प्रधानाध्यापकों की चिंता है कि ऐसी स्थिति में यह भार कौन वहन करेगा?
वहीं, देश की शिक्षा व्यवस्था में अहम स्थान रखने वाली संस्था सीबीएसई की प्रवक्ता रमा शर्मा ने कहा कि वे सरकार के गाइड लाइन का इंतजार कर रही हैं।
सरकार जिस माध्यम से भी शिक्षा देने की रणनीति अपनाने की घोषणा करेगी, सीबीएसई उसका पालन करेगी। फिलहाल अभी तक उन्हें सरकार की तरफ से कोई निर्देश नहीं दिया गया है।
जिला स्तरीय शिक्षा संबंधी आंकड़े (The Unified District Information System, U-DISE) के मुताबिक प्राथमिक शिक्षा देने वाले 80 फीसदी स्कूल सरकारी हैं या सरकार के आर्थिक सहयोग से चलते हैं।
6 वर्ष से 14 वर्ष की आयु के लगभग 29 फीसदी बच्चे प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। 6-14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों को 'मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 (Free And Compulsory Education Act 2009) के तहत शिक्षा मिलना अनिवार्य कर दिया गया है।
प्राथमिक शिक्षा में बच्चों के नामांकन की दर कई राज्यों में 93 से 95 फीसदी तक पहुंच गई है। लेकिन इसके बाद भी 10 वर्ष तक की आयु के आधे बच्चे प्राइमरी स्तर तक की पुस्तकें नहीं पढ़ पाते।
बच्चों के खराब शिक्षा के स्तर के पीछे लगभग 25 फीसदी शिक्षकों की प्रतिदिन अनुपस्थिति पाई गई है। जबकि बच्चों और शिक्षक का अनुपात 35:1 है जो आरटीई कानून के 30:1 के लगभग करीब है। आंकड़ों के मुताबिक केवल 69 फीसदी शिक्षक स्नातक स्तर तक की डिग्री धारण करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति में जब सामान्य विधि से बच्चों को शिक्षा देना संभव नहीं हो पा रहा है तो केवल ऑनलाइन विकल्पों के जरिए या स्कूलों में बेहद कम बच्चों को लाकर सभी बच्चों को शिक्षा देने में कई मुश्किलें सामने आ सकती हैं।
अगर ऐसा किया जाता है तो इससे देश की बड़ी आबादी में बच्चों को शिक्षा से वंचित होना पड़ सकता है या उनकी शिक्षा के स्तर पर गहरा असर पड़ सकता है। इसलिए सरकार को इसके बीच का कोई रास्ता तलाश करना पड़ेगा जिससे बच्चों की शिक्षा भी जारी रहे और उन्हें कोरोना संक्रमण से भी बचाया जा सके।