पैंतालीस साल के हरजीत सज्जन कनाडा के 42वें रक्षा मंत्री हैं। इस ओहदे तक उनका सफर होशियारपुर जिले के गांव बंबेली के खेतीहर परिवार से वैंकुवर की खेत मजदूरी से होता हुआ पुलिस की नौकरी और नैटो फौज की मुहिमों से निकलकर मुकम्मल हुआ है।
लिबरल पार्टी की टिकट पर दक्षिणी वैंकुवर से जीतकर वह जस्टिन ट्रूडो की सरकार में रक्षा मंत्री बने हैं। बंबेली में नंगे पांव वाले बचपन की यादें संभालने वाले हरजीत सज्जन के मन में सिर पर चारा ढो रही दादी की छवि अभी भी ताजा है।
वैंकुवर में हरजीत सज्जन के माता-पिता खेतों में बेरी तोड़ते थे। उन्होंने अपने बच्चों को पाला और पढ़ाया। हरजीत सज्जन ने मंत्री बनने के बाद मैकलीअन नाम की वेबसाइट को बताया, "हम खेतीहर परिवार थे और मेरी दादी सिर पर चारा उठाकर लाती थी। हमारे पास तीन बैल थे और एक सुस्त-सा बैल मेरे आगे-पीछे घूमता रहता था।"
पांच साल के हरजीत सज्जन अपनी मां और बहनों के साथ पिता के पास वैंकुवर चले गए। खुले खेतों में घूमने वाले हरजीत को ज्यादातर घर के अंदर रहना पड़ता था, लेकिन उन्होंने जल्दी ही अपने आप को नए माहौल में ढाल लिया। उस दौर में तीसरी दुनिया से कनाडा आए नौजवान गैंग्स की तरफ आकर्षित थे। लेकिन हरजीत बताते हैं, "नस्लीय भेद-भाव होता था। लेकिन हमारी मंडली को गुंडागर्दी नापसंद थी।"
धर्म की तरफ आकर्षण
इसी दौरान हरजीत का धर्म की तरफ आकर्षण बढ़ा। वह कहते हैं, "मुझे शराब और बुरी आदतों से बचने के लिए आसरे की दरकार थी।" हरजीत ने जब बाल रखने और पगड़ी बांधने का फैसला किया तो उन्हें सलाह दी गई कि इस तरह वह सभी की नजरों में रहेंगे और डेटिंग मुश्किल हो जाएगी। वह याद करते हैं, "इस मामले में कोई मुश्किल नहीं आई। मुझे विश्वास था कि आत्मविश्वास वाले लोगों के सभी कायल होते हैं।"
इसके बाद हरजीत सज्जन फौजी पायलट बनने के इरादे से रिजर्व फोर्स में भर्ती हो गए। ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने बाकियों से ज्यादा रगड़ा बर्दाश्त किया। "उस समय कनाडा में नस्लीय भेद-भाव होता था। वह नस्लीय भेद-भाव से नस्लीय विविधता को परवान किए जाने के बीच का दौर था।"
इस रगड़े से सताए हरजीत ने फौज छोड़ने का फैसला किया और अपने पिताजी से बात की। उन्हें अपने पिता की बात अभी भी याद है। "उन्होंने कहा कि घर आ जाओ, लेकिन याद रखना कि हर पगड़ी बांधने वाला और इसके बिना हर दूसरा आदमी अल्पसंख्यक समुदाय में शामिल है। तुम्हारे वापस लौटने से नाकामयाबी का दाग सभी पर लगेगा।"
जासूसी का अनुभव
पुलिस में हरजीत को दक्षिणी वैंकुवर के गैंग्स की जासूसी के लिए तैनात किया गया। इसके बाद वह जूनियर कैप्टन के तौर पर नैटो सेना में बोस्निया गए जो उनके लिए बड़ा मौका था। इसी जगह पर उनकी निजी जिंदगी का तजुर्बा पेशेवर हुनर के तौर पर सामने आया।
हरजीत बताते हैं, "मैंने सरब बिरादरी को समझा। उस समय सभी सरबों को दानव के तौर पर देखा जा रहा था। हम लोगों से बात करते थे तो पता चलता था कि बाकियों की तरह उनकी भी पारिवारिक जिंदगियां हैं।"
इस मुहिम के बाद उन्होंने पक्के तौर पर फौज में रहने के बजाए वापस पुलिस में जाने का फैसला किया। वह नशा-तस्करी में जुटी गैंग्स के धंधे में माहिर जासूस बने। उनके कई जानकार और स्कूल के साथी गैंग्स में शामिल थे।
उन्होंने इन गैंग्स से निपटने के लिए गैंग्स में शामिल लड़कों के माताओं-पिताओं, किराए पर घर देने वाले मकान मालिकों और तस्करी का माल इधर से उधर ले जाने वालों में मुखबिरों का जाल बिछाया। उनका यही तजुर्बा नैटो के साथ अगली मुहिमों में काम आया।
हरजीत को अफगानिस्तान के कंधार प्रांत में स्थानीय समुदाय के अंदर मुखबिरों का ढांचा बनाने में कामयाबी मिली। कंधार की स्थानीय भाषा पंजाबी के साथ मिलती-जुलती होने के कारण उन्हें स्थानीय लोगों से बात करने के लिए किसी अनुवादक की जरूरत नहीं पड़ी।