मानव तस्करी के मामले अब तकरीबन सभी राज्यों में दर्ज हो रहे हैं। आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, इसके लिए 332 मानव तस्करी रोधी इकाइयां स्थापित की गई हैं। सैंकड़ों केस दर्ज होने के बावजूद मुट्ठीभर आरोपियों को ही सजा मिल पाती है।
इसके पीछे मानव तस्करों की एक भयावह साजिश का खुलासा हुआ है। पश्चिम बंगाल से लगती बांग्लादेश की सीमा और इससे पहले दिल्ली में तैनात रहे केंद्रीय सुरक्षा बल के एक अधिकारी का कहना है कि मानव तस्कर, लोकल पुलिस के साथ बड़े पैमाने पर सेटिंग कर रहे हैं।
सीमा पर जैसे ही कोई तस्कर पकड़ा जाता है तो उसे लोकल पुलिस के हवाले कर देते हैं। कुछ दिन बाद मालूम होता है कि आरोपी की जमानत हो गई। दिल्ली, झारखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में मानव तस्कर एक सिंडिकेट बनाकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।
जैसे ही ये पुलिस को सौंपे जाते हैं, तभी इन्हें बाहर निकालने की तैयारी शुरू हो जाती है। इनके समूह में कानून के जानकार और एनजीओ संचालक भी रहते हैं। यही वजह है कि मानव तस्करी के टॉप 5 राज्यों में केवल दर्जनभर आरोपियों को ही सजा मिल पाती है।
बता दें कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी सौ करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता से विभिन्न राज्यों में 332 मानव तस्करी रोधी इकाइयां स्थापित की गई थीं। साल 2016 में मानव तस्करी के 8,132 मामले दर्ज हुए थे। साल 2017 में 2854 और वर्ष 2018 में 2,465 केस सामने आए थे।
पश्चिम बंगाल में 2016 में 3,579 केस दर्ज किए गए। इनमें से 11 आरोपियों को ही दोषी करार दिया जा सका। अगले साल 1,357 केस सामने आए। इनमें से भी 3 आरोपियों के खिलाफ ही दोष साबित हुआ। साल 2018 में 172 केसों में से 18 आरोपी को दोषी माना गया।
राजस्थान में 2016 के दौरान दर्ज हुए 1,422 केसों में से 47, 2017 में 316 केसों में शून्य और 2018 में 86 केस दर्ज हुए थे। इनमें भी कोई आरोपी दोषी करार नहीं दिया गया। गुजरात में 2016 के दौरान 548 केस, जिनमें से 6 आरोपी दोषी करार दिए गए।
2016 में ही महाराष्ट्र में 517 केस दर्ज हुए थे, जिनमें से केवल 6 आरोपियों के खिलाफ दोष साबित हो सका। 2018 के दौरान महाराष्ट्र में 311 केसों में से महज 4 आरोपी दोषी करार दिए गए। तमिलनाडु में 2016 के दौरान 434 केसों में से 72 आरोपी दोषी करार दिए गए।
खास बात है कि पश्चिम बंगाल में 11 मानव तस्करी रोधी इकाइयां, राजस्थान में 19, गुजरात में 15, महाराष्ट्र में 18 और तमिलनाडु में 19 इकाइयां स्थापित की गई हैं। पिछले साल मानव तस्करी के 2260 केस दर्ज किए गए थे। लगभग 6,616 पीड़ितों ने तस्करी की बात कही। इनमें 2,914 बच्चे और 2,702 वयस्क शामिल थे।
विभिन्न एजेंसियों की मदद से 6,571 पीड़ित रिहा कराए गए और 5,128 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। केंद्र सरकार ने एनआईए 'संशोधन' अधिनियम 2019 के तहत इस अधिनियम की अनुसूची में संशोधन किया है। अब एनआईए को मानव तस्करी से संबंधित मामलों की जांच आईपीसी की धारा 370 और 370 'क' के अंतर्गत करने की शक्ति प्रदान की गई है।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इसी अधिनियम के तहत गत सितंबर में पहली बार मानव तस्करी का मामला दर्ज किया था। जांच एजेंसी ने बांग्लादेशी महिलाओं की तस्करी में संलिप्तता और उनका यौन उत्पीड़न करने के आरोप में तीन लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी के इस मामले में दो दिन पहले ही हैदराबाद की विशेष अदालत में 9 बांग्लादेशी नागरिकों सहित 12 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया है। इस मामले में बांग्लादेशी नागरिकों के अलावा पश्चिम बंगाल के राहुल अमीन धाली, असद हसन और महाराष्ट्र के शरीफुल शेख को आरोपी बनाया गया है।