केंद्रीय गृह मंत्रालय, बॉर्डर की चौकसी को अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए कई उपायों पर गौर कर रहा है। कुछ अहम योजनाओं का खाका भी तैयार हो चुका है। इनमें केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में होने वाले बड़े बदलाव भी शामिल हैं। यह तय है कि जब इन बलों के 'फैंटम' बॉर्डर पर निकलेंगे, तो दुश्मन हिल जाएगा। अफसरों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे बॉर्डर पर जवानों के साथ एक माह में पांच दिन तक रहेंगे।
बॉर्डर पर युवा अफसरों की टोली तैयार होगी जो बाइक पर चलेगी। इसे हर तरह के आधुनिक हथियार एवं दूसरे उपकरण मुहैया कराए जाएंगे। जहां बाइक नहीं चल सकतीं, वहां पैदल गश्त होगी। यह टोली 'फैंटम' की फुर्ती से दुश्मन का खात्मा करने में सक्षम होगी। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों को नियमित तौर पर हथियार चलाने का अवसर मिलता रहे, इसके लिए निकटवर्ती राज्यों की फायरिंग रेंज का अभ्यास के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।
मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद इस बाबत कई दफा बैठक कर चुके हैं। उन्होंने सभी अर्धसैनिक बलों में जवानों के लिए एक साल में 100 दिन की अवकाश योजना पर तेजी से काम करने के लिए कहा है। कई जगहों पर यह योजना लागू हो रही है। केंद्रीय गृह मंत्री ने बॉर्डर गार्ड फोर्स से यह सुझाव भी मांगा था कि इन बलों में सीमावर्ती राज्यों से ही पचास फीसदी नियुक्ति क्यों न कर दी जाए।
पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, चीन और दूसरे देशों से लगती सीमाओं पर युवा अफसरों को ज्यादा से ज्यादा मौका दिया जाए। इन अफसरों की टोली, बॉर्डर के हर हिस्से को देखेगी। सीमा पर सुरंग है या दुश्मन की कोई दूसरी हरकत हो रही है, उससे निपटने की जिम्मेदारी इसी टोली को सौंपी जाएगी।
आईईडी रोधी वाहन, बुलेटप्रूफ जैकेट, ड्रोन और संचार के उपकरणों के लिए खरीद प्रणाली ऐसी हो कि उसे प्राधिकृत अधिकारी से बिना किसी देरी के मंजूरी मिल जाए। केंद्रीय सुरक्षा बलों से जितनी भी बटालियनें एनडीआरएफ में भेजी जाती हैं, उनकी भरपाई के लिए नई बटालियन खड़ी करने की स्वीकृति दी जाए।
सीमावर्ती क्षेत्रों के अस्पतालों में एमबीबीएस डॉक्टरों को इंटर्नशिप का मौका मिले। सीएपीएफ से जुड़े अस्पतालों में सीमावर्ती लोगों का इलाज किया जाए। उन लोगों की भरपूर मदद की जाए। चूंकि ये लोग मानवीय इंटेलिजेंस का एक बड़ा स्रोत बन सकते हैं, इसलिए उन तक केंद्र सरकार की योजनाएं पहुंचाने का प्रयास किया जाना चाहिए। साथ ही सिविक एक्शन प्रोग्राम बढ़ाए जाएंगे।
बॉर्डर पर तैनात जवानों का स्वास्थ्य बेहतर रहे, इसलिए उनका नियमित हेल्थ चेकअप हो। खासतौर पर आतंक और नक्सल प्रभावित इलाकों में ड्यूटी देने वाले जवानों की मनोवैज्ञानिक जांच भी की जाए। यह रिपोर्ट भी तैयार की जाए कि ऐसे कर्मियों की संख्या कितनी है जिनके इलाज में एक वर्ष के दौरान पांच लाख रुपये से अधिक की धनराशि खर्च हुई है।
सभी सीमाओं पर एंटी ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल हो। बीएसएफ के अलावा दूसरी बॉर्डर गार्ड फोर्स भी सीआईबीएमएस उपकरण प्रयोग में लाएं। सीमा के दूसरी तरफ जितनी भी भाषाएं बोली जाती हैं, वे सभी अर्धसैनिक बलों के जवानों को भी सिखाई जाएं।