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Home Ministry: CRPF डीआईजी को जबरन रिटायरमेंट देने के मामले में नया मोड़, हाई कोर्ट ने जारी किया नोटिस

सार

Home Ministry: केंद्र सरकार के नियमानुसार, 25 साल की सेवा के बाद या संबंधित कार्मिक/अधिकारी की आयु 50 साल होने पर उसकी समीक्षा की जाती है। पहले इस समीक्षा को हल्के में ले लिया जाता था। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में इस समीक्षा पर गहराई से काम होने लगा...
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Manipur High Court - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल, 'सीआरपीएफ' के एक डीआईजी को उसके तय रिटायरमेंट से कई वर्ष पहले ही सेवा से हटाने का आदेश जारी किया गया था। उस आदेश के खिलाफ डीआईजी रविंद्र सिंह रौतेला हाई कोर्ट में चले गए। हालांकि ऐसे मामले में राहत की गुंजाइश काफी कम रहती है। केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों में भी समय से पूर्व अधिकारियों और कर्मियों को जबरन रिटायरमेंट दी जाती रही है। सीआरपीएफ में आपसी तालमेल के अभाव के कारण सरकारी वकील को तय समय पर केस से जुड़े तमाम तथ्यों से अवगत नहीं कराया गया। इसके चलते कोर्ट को वस्तुस्थिति की जानकारी नहीं दी जा सकी। नतीजा, मणिपुर उच्च न्यायालय ने इस मामले में विभाग यानी सीआरपीएफ को नोटिस जारी कर दिया है। बल को अब काउंटर शपथ पत्र जमा कराना है।

जुलाई में डीआईजी रेंज 'इंफाल' आरएस रौतेला को जबरन रिटायरमेंट देने के आदेश जारी किए गए थे। आरोप थे कि रौतेला ने कई जगहों पर अपनी मनमानी की है। उन्होंने फोर्स के नियमों का कथित तौर से उल्लंघन किया है। रौतेला को कई बार चेताया गया, लेकिन वे अपनी मनमर्जी से काम करते रहे। नतीजा, बल मुख्यालय ने उन्हें तीन माह का नोटिस देकर घर भेजने के आदेश जारी कर दिए। केंद्र सरकार के नियमानुसार, 25 साल की सेवा के बाद या संबंधित कार्मिक/अधिकारी की आयु 50 साल होने पर उसकी समीक्षा की जाती है। पहले इस समीक्षा को हल्के में ले लिया जाता था। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में इस समीक्षा पर गहराई से काम होने लगा। पहले रिव्यू में अगर किसी अफसर की खराब रिपोर्ट है, तो उसे छोटी मोटी सजा देकर छोड़ देते थे। अब न केवल अर्धसैनिक बलों, अपितु केंद्र के दूसरे विभागों में भी ऐसे सख्त कदम उठाए जा रहे हैं।

डीओपीटी द्वारा इस बाबत समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। हालांकि तब मुख्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसे बल की एक सामान्य प्रक्रिया बताया था। अगर कोई अधिकारी या जवान, तय नियमों के मुताबिक काम नहीं करेगा तो उसे समय पूर्व सेवानिवृति दे दी जाती है। डीआईजी पर आरोप है कि उन्होंने कभी भी टीम भावना से काम नहीं किया। सीआरपीएफ में केवल एक जगह पर नहीं, बल्कि उनकी तैनाती वाले कई स्थानों से नकारात्मक रिपोर्ट मिली थी।

सीआरपीएफ द्वारा जबरन रिटायरमेंट का आदेश जारी करने के बाद डीआईजी रौतेला ने हाई कोर्ट की शरण ली। उन्होंने अपना प्रतिवेदन दिया और बल की कार्रवाई पर सवाल उठाया। विभाग को प्रतिवेदन पर जवाब देना चाहिए था, जो समय पर नहीं दिया गया। सरकारी वकील डीएसजीआई समरजीत सिंह, बल की तरफ से कोर्ट में पेश हुए। वहां बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो गई। प्रतिवेदन को लेकर बल ने क्या किया, क्या नहीं किया, ये सब जानकारी कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत नहीं हो सकी। कोर्ट में यह भी नहीं बताया जा सका कि आखिर प्रतिवेदन में क्या हुआ है। केस से जुड़े सभी तथ्य कोर्ट के सामने नहीं आ सके। इसके कई कारण हो सकते हैं। संभव है कि डीआईजी को बचाने के लिए डीएसजीआई को समय रहते जानकारी नहीं प्रदान की गई हो। जब उन्हें कुछ नहीं मालूम तो वे अदालत में विभाग का मजबूत पक्ष कैसे रख सकते थे। हाई कोर्ट ने रौतेला की याचिका स्वीकार करते हुए अंतरिम आर्डर पास कर दिया है। अब विभाग को काउंटर शपथ पत्र के माध्यम से अपना जवाब देना है।

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