फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पाकिस्तान ने कश्मीर में पत्थरबाजी और हिंसक घटनाओं में बच्चों को बनाया ढाल

Thu, 28 Jun 2018 02:12 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
विज्ञापन

पाकिस्तान के प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिद्दीन ने ना केवल बच्चों को भर्ती किया है बल्कि जम्मू और कश्मीर में सुरक्षाबलों के साथ होने वाली लड़ाई में उनका इस्तेमाल भी किया है। गुरुवार को जारी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।

विज्ञापन


संयुक्त राष्ट्र के महासचिव द्वारा 'बच्चे और सशस्त्र संघर्ष' को लेकर जारी की गई सालाना रिपोर्ट में जनवरी से दिसंबर 2017 की समयावधि के दौरान विश्वभर में सशस्त्र संघर्षों में 10,000 से ज्यादा बच्चे मारे गए या विकलांगता का शिकार हुए थे। वहीं 8000 से ज्यादा को भर्ती किया गया या फिर लड़ाकों के रूप में इस्तेमाल किया गया।

इस रिपोर्ट में 20 देशों को शामिल किया गया है। जिसमें युद्धरत सीरिया, अफगानिस्तान और यमन हैं और साथ ही भारत, फिलीपींस और नाइजीरिया की स्थितियों के बारे में बताया गया है। भारत की परिस्थिति को लेकर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अंटोनियो गुट्रेस (यूएन) ने कहा, सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच होने वाली हिंसा की घटनाओं का असर बच्चों पर लगातार पड़ रहा है। खासतौर से छत्तीसगढ़, झारखंड और जम्मू और कश्मीर के तनाव के दौरान गंभीर उल्लंघन हुए हैं।
विज्ञापन


रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों की भर्ती और उनके इस्तेमाल के तीन मामले जम्मू-कश्मीर में सामने आए हैं। जिसमें दो आतंकी संगठनों ने सुरक्षाबलों के साथ लड़ाई के दौरान बच्चों का उपयोग किया था। रिपोर्ट के अनुसार जहां एक मामला जैश-ए-मोहम्मद का है वहीं दो मामले हिजबुल मुजाहिद्दीन के हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अपुष्ट सूत्रों के जरिए यह पता लगा है कि सुरक्षाबलों ने भी बच्चों को खबरी और जासूसों के तौर पर इस्तेमाल किया है।

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि उसे लगातार बच्चों की भर्ती करने की सूचना मिल रही है। जिसमें छत्तीसगढ़ और झारखंड के नक्सली भी शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार नक्सली बच्चों को भर्ती करने के लिए लॉटरी सिस्टम का प्रयोग करते हैं। जिसकी वजह से बच्चे लगातार सुरक्षाबलों और सशस्त्र समूहों के बीच होने वाले ऑपरेशन में मारे जा रहे हैं या फिर घायल हो रहे हैं। 

सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में 188 नागरिकों की मौत हुई है लेकिन बच्चों को लेकर किसी तरह के आंकड़े मौजूद नहीं हैं। इस साल मार्च में पुलवामा जिले के पड़गमपोरा गांव में सुरक्षाबलों और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों के बीच हुई मुठभेड़ में 15 साल के लड़के की मौत हो गई थी। गुट्रेस ने रिपोर्ट में भारत सरकार से बच्चों की भर्ती करनेवालों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने और बच्चों के खिलाफ हो रही हिंसा को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयासों में संयुक्त राष्ट्र को भी शामिल करने के लिए कहा है।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें