विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दुनिया के सबसे विषैले रोगजनकों पर चिंता जताते हुए भारत सहित दुनियाभर के सभी देशों से इनके टीके पर काम करने का आह्वान किया है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि इन रोगजनकों से जानवरों और इंसानों में होने वाली बीमारियों पर सबसे पहले ध्यान देने की जरूरत है। इनके इलाज और टीके की खोज करनी चाहिए ताकि भविष्य में इनसे बचा जा सके।
इनमें से तीन सबसे घातक रोगजनक एचआईवी, मलेरिया और तपेदिक है, जिनकी वजह से हर साल 25 लाख लोगों की मौत हो रही है। डब्ल्यूएचओ ने पांच अलग अलग देश अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड, सिंगापुर और घाना के चिकित्सा संस्थानों के साथ मिलकर एक अध्ययन भी किया है जिसे ई बायोमेडिसिन जर्नल में प्रकाशित किया है।
इसके मुताबिक, कुल 17 सबसे घातक रोगजनक नियमित रूप से आबादी में बीमारियों का कारण बन रहे हैं। इससे बचने के लिए नए टीके की खोज पर सबसे पहले काम होना चाहिए।
इलाज खर्च में भी आएगी कमी
अगर भारत की बात करें तो 17 में से करीब नौ जानलेवा रोगजनक भारत की आबादी में मौजूद हैं जिनमें ई कोली, एचआईवी, क्लेबसिएला निमोनिया, टीबी यानी तपेदिक, स्ट्रेप्टोकोकस, हेपेटाइटिस सी, शिगेला, आरएसवी और डेंगू संक्रमण शामिल है।
डब्ल्यूएचओ के टीकाकरण,
टीके और जैविक निदेशक डॉ. केट ओ ब्रायन ने कहा है कि यह अध्ययन टीकों का आकलन करने के लिए व्यापक क्षेत्रीय विशेषज्ञता और डेटा का उपयोग करता है जो न केवल बीमारियों को कम करेगा बल्कि चिकित्सा लागत में भी कमी आएगी।
इसका तोड़ निकालने के बहुत नजदीक दुनिया
डब्ल्यूएचओ का बयान
डब्ल्यूएचओ ने बताया कि डेंगू वायरस, ग्रुप बी स्ट्रेप्टोकोकस, अतिरिक्त-आंत्र रोगजनक ई. कोलाई, माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस यानी टीबी और रेस्पिरेटरी सिंकाइटियल वायरस (आरएसवी) रोगजनक के खिलाफ टीके जल्द आएंगे। इनमें से तीन डेंगू, टीबी और आरएसवी के खिलाफ भारत में टीका परीक्षण लगभग अंतिम दौर में है।
बता दें कि हाल ही में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने 2026 में डेंगू का पहला टीका मिलने की घोषणा की है जबकि टीबी के लिए आईसीएमआर 19 राज्यों के साथ परीक्षण कर रहा है। अब तक करीब 20 हजार लोगों को पहली खुराक भी दी गई है।