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हिमालय में बाढ़ का खतरा: सात साल में 45.75% बढ़ा निर्माण; 2.94 लाख लोगों पर मंडराया संकट

Sat, 17 Oct 2026 06:55 PM IST
डॉ. संजय पांडेय अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।

सार

नेपाल, भारत और चीन के हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़ के खतरे वाले इलाकों में तेजी से निर्माण बढ़ रहा है। एक नए अध्ययन के मुताबिक, 2016 से 2023 के बीच इन क्षेत्रों में इमारतों का कुल क्षेत्रफल 45.75 फीसदी बढ़ा है। ग्लेशियर झीलों के फटने से बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में निर्माण करीब 78 फीसदी बढ़ा। अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2026 में करीब 2.94 लाख लोग संभावित बाढ़ जोखिम वाले भवनों में रह सकते हैं। शोधकर्ताओं ने बेहतर निगरानी और समय पर चेतावनी देने की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया है।
 
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हिमालय में बाढ़ का खतरा - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से फैलती बस्तियां और बदलती प्राकृतिक परिस्थितियां बाढ़ के खतरे को गंभीर बना रही हैं। नेपाल, भारत और चीन के हिमालयी इलाकों में करीब 2.94 लाख लोग ऐसे भवनों में रह रहे हैं, जो संभावित बाढ़ के जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। एक नए अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2016 से 2023 के बीच इन क्षेत्रों में इमारतों का कुल क्षेत्रफल 45.75 फीसदी बढ़ गया। ग्लेशियर झीलों के फटने से बाढ़ आने की आशंका वाले इलाकों में यह वृद्धि करीब 78 फीसदी रही। शोधकर्ताओं ने चेताया है कि संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण और आबादी के विस्तार को देखते हुए बेहतर निगरानी तथा आपदा से पहले चेतावनी देने की व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है।
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यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है। इसमें हिमालयी झीलों के आसपास और नदी घाटियों में स्थित इमारतों के फैलाव के साथ संभावित बाढ़ से प्रभावित होने वाली आबादी का आकलन किया गया है।

किन इलाकों को अध्ययन में शामिल किया गया? 
शोधकर्ताओं ने नेपाल, भारत और चीन के हिमालयी क्षेत्रों में 1,361 झीलों के आसपास के इलाकों का अध्ययन किया। इसमें झीलों से नीचे की ओर 50 किलोमीटर तक के क्षेत्र को शामिल किया गया। इमारतों के आकार और फैलाव का अनुमान लगाने के लिए पांच अलग-अलग आंकड़ा स्रोतों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद नदी के किनारे से 50 मीटर की ऊंचाई के भीतर स्थित इमारतों के क्षेत्रफल को संभावित बाढ़ जोखिम का संकेतक माना गया। अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2016 में ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में इमारतों का कुल क्षेत्रफल 12.38 वर्ग किलोमीटर था जो 2023 में बढ़कर 18.04 वर्ग किलोमीटर हो गया। इस तरह सात वर्षों में इसमें 5.66 वर्ग किलोमीटर यानी 45.75 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। सबसे अधिक चिंता ग्लेशियर झीलों के फटने से बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों में निर्माण बढ़ने को लेकर है। इन इलाकों में इमारतों का क्षेत्रफल 2016 में 0.72 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में बढ़कर 1.28 वर्ग किलोमीटर पहुंच गया। यह करीब 77.78 फीसदी की बढ़ोतरी है।
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नेपाल में 1.08 लाख लोगों पर संभावित जोखिम
इमारतों के क्षेत्रफल के आधार पर शोधकर्ताओं ने आबादी का भी अनुमान लगाया। इसके मुताबिक वर्ष 2026 में अध्ययन क्षेत्र के करीब 2,93,800 लोग संभावित बाढ़ जोखिम वाले भवनों में रह सकते हैं। यह संबंधित अध्ययन क्षेत्र की कुल आबादी का लगभग 18 फीसदी है।इनमें नेपाल के करीब 1,08,500 लोग शामिल हैं। इनमें से लगभग 22,800 लोग नदी के किनारे से 10 मीटर की ऊंचाई के भीतर स्थित क्षेत्रों में रहते हैं। ऐसे इलाकों में बाढ़ आने पर पानी तेजी से पहुंच सकता है और लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने के लिए बहुत कम समय मिल सकता है।अध्ययन में वर्ष 2015 से 2030 के बीच संभावित बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी में करीब 17,900 लोगों की वृद्धि का अनुमान भी लगाया गया है। यह लगभग छह फीसदी की बढ़ोतरी है। इससे संकेत मिलता है कि संवेदनशील क्षेत्रों में आबादी बढ़ने के साथ आपदा प्रबंधन की चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं।

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मानसूनी बारिश और ग्लेशियर झीलें बड़ी चुनौती
हिमालय में बाढ़ का खतरा केवल मानसून की भारी बारिश तक सीमित नहीं है। कम समय में अत्यधिक वर्षा, पहाड़ों से बहकर आने वाला मलबा और ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों का अचानक फटना भी विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकता है। ग्लेशियर झीलों के प्राकृतिक बांध टूटने पर बड़ी मात्रा में पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ कहा जाता है।पहाड़ों की संकरी घाटियों और ढलानदार भूभाग के कारण पानी का बहाव तेज हो सकता है। इससे रास्ते में आने वाली बस्तियों, सड़कों, पुलों और इमारतों को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। जलवायु परिवर्तन के बीच हिमालयी ग्लेशियरों और झीलों की स्थिति पर लगातार नजर रखना भी महत्वपूर्ण हो गया है।
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आंकड़ों में अनिश्चितता, निगरानी जरूरी
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि जोखिम का अधिक सटीक आकलन करने के लिए इमारतों की संख्या, आबादी और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़े विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत है।संवेदनशील बस्तियों की पहचान, सुरक्षित निर्माण, ग्लेशियर झीलों की निगरानी और समय पर चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था से संभावित नुकसान कम किया जा सकता है। हिमालयी नदी घाटियों में विकास की योजनाएं बनाते समय बाढ़ के खतरे को ध्यान में रखना जरूरी है, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लोगों की जान और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
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