उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने प्रकृति संरक्षण को जनांदोलन बनाने की अपील करते करते हुए सभी नागरिकों विशेषकर युवाओं से सक्रिय रूप से इसका हिस्सा बनने को कहा है। ‘हिमालय दिवस’ पर बुधवार को वेबिनार को संबोधित करते हुए नायडू ने विकास के चक्र को इस तरह से पुनर्जीवित करने का आह्वान किया ताकि मनुष्य और प्रकृति साथ पनपे और मौजूद रहें। उन्होंने कहा कि हिमालय अमूल्य खजाने का घर है और हमें इसके संरक्षण व सुरक्षा पर जोर देना चाहिए। इस दौरान केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा लिखी पुस्तक संसद में हिमालय की प्रति वर्चुअल तौर पर उपराष्ट्रपति को भेंट की गई।
नाजुक हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र के सामने मौजूद खतरे की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए नायडू ने कहा, पर्यावरण की कीमत पर विकास नहीं होना चाहिए। अगर हिमालय नहीं होगा तो भारत एक रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगा। ये पहाड़ी इलाका न सिर्फ भारत को सेंट्रल एशिया से आने वाली बर्फीली और सूखी हवाओं से बचाता है, बल्कि यह मानसूनी हवाओं को रोककर उत्तर भारत में होने वाली वर्षा का भी मुख्य कारक है। 54000 ग्लेशियर वाला हिमालय एशिया की 10 नदियों का उद्गम स्थल है। यह आधी मानवता की जीवन रेखा है। इतना ही नहीं, हिमालय में हाइड्रो पावर पैदा करने की अपार क्षमता है, जिससे यह स्वच्छ ऊर्जा का विश्वसनीय स्रोत बन सकता है। इससे कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिलेगी।
ग्लेशियर पिघलने पर जताई चिंता
उपराष्ट्रपति ने तेजी से पिघलते ग्लेशियरों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेश्यिर तेजी से पिघल रहे हैं, इससे एक अरब से ज्यादा लोगों के जीवन पर गंभीर असर पड़ रहा है, जो पीने, सिंचाई और ऊर्जा की जरूरतों के लिए इनके पानी पर निर्भर हैं। हम प्रकृति के विनाश को जारी नहीं रख सकते। अगर हम प्रकृति को नजरअंदाज करेंगे या इसका अत्यधिक दोहन करेंगे तो हम अपने भविष्य के खतरे में डालेंगे।
उत्तराखंड, सिक्किम, मेघालय की तारीफ की
नायडू ने कहा, जैविक कृषि नाजुक पारिस्थितिकी में सबसे अच्छा तरीका हो सकता है। सिक्किम, मेघालय और उत्तराखंड जैसे राज्यों की सराहना की जिन्होंने इस दिशा में प्रगति की है। उन्होंने सरकारों, वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालयों से जैविक खेती अपनाने में किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान खोजने की अपील की।