Himachal Politics: 27 फरवरी को हिमाचल की एक राज्यसभा सीट के लिए मतदान कराए गए थे। यहां कांग्रेस के छह विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी जिसके कारण पार्टी के उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी हार गए। अब इन विधायकों की सदस्यता रद्द हो गई है।
हिमाचल प्रदेश में सियासी उठापटक जारी है। इसकी शुरुआत 27 फरवरी को संपन्न राज्यसभा चुनाव से हुई जिसमें सत्ताधारी कांग्रेस के छह विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। बात यहीं तक सीमित नहीं रही चुनाव के अगले दिन सरकार के मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बुधवार को बजट पास करने के दौरान व्हिप जारी होने के बावजूद क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायक सदन से गैर हाजिर रहे। व्हिप के उल्लंघन के चलते गुरुवार (29 फरवरी) को विधानसभा अध्यक्ष ने उन सभी छह विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी जिन्होंने क्रॉस वोटिंग की थी।
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इस सियासी उठापटक के बीच प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह का बयान आया है। प्रतिभा ने कहा कि सदस्यता रद्द करने का फैसला जल्दबाजी में हुआ है। उधर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा भी सक्रिय हो गई है। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर राज्यपाल से मुलाकात कर चुके। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को सत्ता में रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। इससे पहले मतदान के दिन जयराम ठाकुर ने कहा था कि सरकार अल्पमत में है।
आइए जानते हैं कि हिमाचल में बागी विधायकों पर क्या फैसला हुआ है? विधायकों की सदस्यता क्यों रद्द की गई? इन विधायकों के पास अब क्या विकल्प है?
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हिमाचल प्रदेश राज्यसभा चुनाव
- फोटो : Amar Ujala
हिमाचल में बागी विधायकों पर क्या फैसला हुआ है?
कांग्रेस के सभी छह बागी विधायक अयोग्य घोषित कर दिए गए हैं। यह फैसला विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने गुरुवार को सुनाया है। राज्य के संसदीय कार्य मंत्री हर्ष वर्धन चौहान ने दलबदल विरोधी कानून के तहत छह विधायकों को अयोग्य ठहराने के लिए याचिका दायर की थी।
28 फरवरी को दोनों पक्षों को सुनने के बाद अगले दिन विधानसभा अध्यक्ष ने 30 पेज का आदेश दिया है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष पठानिया ने कहा, 'दलबदल विरोधी कानून के तहत छह विधायकों के खिलाफ मुझे याचिका मिली थी। छह विधायक जिन्होंने चुनाव कांग्रेस से लड़ा और दलबदल विरोधी कानून के तहत उनके खिलाफ याचिका मिली। मैंने उन छह विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया है, अब वे हिमाचल प्रदेश विधानसभा के सदस्य नहीं हैं।'
विधायकों की सदस्यता क्यों रद्द की गई?
बागी विधायकों पर आरोप है कि भाजपा के राज्यसभा प्रत्याशी हर्ष महाजन के पक्ष वोटिंग की। इसके अलावा बजट पास करने के दौरान व्हिप जारी होने के बावजूद ये सदन से गैर हाजिर रहे। बागी हुए कांग्रेस विधायकों में देवेंद्र कुमार भुट्टो, राजेंद्र राणा, इंद्रदत्त लखनपाल, चैतन्य शर्मा, सुधीर शर्मा और रवि ठाकुर के नाम शामिल हैं।
दरअसल, 27 फरवरी को तीन राज्यों की 15 राज्यसभा सीटों के लिए मतदान कराए गए थे जिसमें हिमाचल प्रदेश भी शामिल हैं। प्रदेश की एक सीट के लिए दो उम्मीदवार थे। इसके कारण यहां मतदान कराना पड़ा। कांग्रेस ने अभिषेक मनु सिंघवी को उम्मीदवार बनाया तो भाजपा ने हर्ष महाजन को टिकट दिया था।
राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार की जीत के लिए 35 वोट की जरूरत थी। संख्या बल के हिसाब से कांग्रेस के लिए यह लड़ाई बहुत आसान दिख रही थी। इसके बाद भी यहां पास पलट गया। मतदान के नतीजे आए तो दोनों उम्मीदवारों को 34-34 वोट मिले। इसके बाद फैसला पर्ची से हुआ। इसमें हर्ष महाजन जीत गए। मतदान के दौरान 40 विधायकों वाली सत्ताधारी कांग्रेस के कम से कम कम छह सदस्यों ने क्रॉस वोटिंग की। तीन निर्दलीय विधायकों ने भी भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया। राज्यसभा में क्रॉस वोटिंग करने पर विधायकों की सदस्या को खतरा नहीं था, लेकिन एक बाद बजट पारित होने के दौरान कांग्रेस ने विधायकों को व्हिप जारी किया था। इस व्हिप का उल्लंघन की बागी विधायकों की सदस्यता जाने की वजह बना।
इन विधायकों के पास अब क्या विकल्प है?
छह विधायकों की अयोग्यता से कई संवैधानिक सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। अब इन विधायकों का भविष्य क्या है। इस विषय पर हमने सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता विराग गुप्ता से बात की। विराग कहते हैं, 'विधायकों के पास तीन तरह के विकल्प हैं। पहला है कि विधायक हाईकोर्ट में जाएं और वहां पर राहत लेने की कोशिश करें। इसका मुख्य आधार यह रहेगा कि अयोग्यता के बारे में फैसला देने से पहले स्पीकर ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन नहीं किया। उनको नोटिस जारी करके जवाब देने का पूरा समय नहीं दिया गया। उनकी सुनवाई नहीं की गई। उस पर हो सकता है कि कोर्ट स्पीकर को बोले कि नए तरीके से फिर से अयोग्यता का निर्धारण करें। वहां पर यह बात भी आ सकती है कि राज्यसभा के चुनावों में व्हिप के उल्लंघन पर अयोग्यता का मामला नहीं बनता है। दूसरा यह कि अगर हाईकोर्ट में उनको राहत नहीं मिलती है तो अयोग्यता की वजह से उन सीटों पर वैकेंसी हो जाएगी और वह नए तरीके से चुनाव लड़ें। चुनाव आयोग वहां पर चुनाव घोषित कराए और नए तरीके से चुनाव कराए।'
विराग कहते हैं, 'तीसरा विकल्प है जिसकी उम्मीद नहीं है, कि बड़े पैमाने पर दलबदल हो। लेकिन अगर विधायक एक बार अयोग्य हो जाते हैं तो फिर दो तिहाई विधायकों का एक नए तरीके से समूह बनाना पड़ेगा इसलिए फिलहाल उनके पास सबसे अच्छा विकल्प यही है कि कोर्ट जा करके और वहां से स्पीकर के फैसले को चुनौती दे। क्योंकि दूसरी जगहों जैसे महाराष्ट्र और तमिलनाडु और दूसरी तमाम जगहों पर अयोग्यता के मामलों में कई-कई साल में फैसला हुआ और यहां पर तुरंत फैसला हुआ तो उस पर प्राकृतिक न्याय के आधार पर चुनौती दी जा सकती है। इस बीच में अगर वहां पर सत्ता का परिवर्तन हो गया तो फिर उनके योग्यता के बारे में नए स्पीकर नए तरीके से पुनर्विचार भी कर सकते हैं।'