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हिलेरी-ट्रंप की जीत-हार से नहीं बदलेगा भारत-अमेरिका समीकरण

Tue, 08 Nov 2016 03:51 AM IST
कंवल सिब्बल (पूर्व विदेश सचिव) नई दिल्ली।
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अमेरिकी चुनाव अपनी परिणति की ओर बढ़ रहा है। जाहिर तौर पर पूरी दुनिया सबसे ताकतवर देश के चुनाव पर बारीकी से निगाह रख रही है। जहां तक भारत की बात है तो सबसे अहम जिज्ञासा यह है कि डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप की जीत का दोनों देशों के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा।
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मेरा मानना है कि चाहे ट्रंप जीतें या फिर हिलेरी, जहां तक भारत-अमेरिका के लगातार मजबूत हो रहे द्विपक्षीय संबंधों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। ऐसा इसलिए कि दोनों ही दल भारत से बेहतर रिश्ते बनाए रखने के हिमायती हैं।

हां, अहम बात यह है कि हिलेरी-ट्रंप की जीत-हार से विभिन्न मुद्दों पर इनकी अलग-अलग राय और सोच दक्षिण एशिया की कूटनीतिक परिस्थितियों के साथ-साथ भारत के रूस सहित अन्य देशों से संबंधों के अलावा अमेरिका में भारतीयों के रोजगार पाने के अवसरों पर असर जरूर डालेंगे।
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सबसे पहले मैं दोनों उम्मीदवारों के व्यक्तित्व और इनकी भारत और दक्षिण एशिया को ले कर समझ की बात करूंगा। इस मोर्चे पर हिलेरी की जीत भारत के लिए फायदेमंद है। ओबामा सरकार में विदेश मंत्री की भूमिका निभा चुकी हिलेरी को इस क्षेत्र का व्यापक अनुभव है।

जबकि ट्रंप के मामले में कई मोर्चों पर अब भी अस्पष्टता है। सीधे शब्दों में कहें तो हिलेरी भारत को जानती हैं और भारत हिलेरी को जानता है। जबकि ट्रंप के बारे में ऐसा नहीं का जा सकता। इस लिहाज से अगर जीत डेमोक्रेट को मिली तो दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों की गाड़ी को आगे बढ़ाने केलिए नए सिरे से कूटनीतिक मशक्कत की समझ नहीं होगी।

जबकि रिपब्लिकन की जीत से कई मुद्दों पर भारत-अमेरिका को नए सिरे से अपनी समझ विकसित करनी होगी।
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दोनों देशों के रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला

हालांकि आतंकवाद और रूस से संबंध के सवाल पर स्थिति इसके ठीक विपरीत है। हिलेरी के मन में पाकिस्तान के प्रति अतिरिक्त सहानुभूति है। यह जानने समझने के बावजूद की भारत दशकों से सीमा पार आतंकवाद की मार झेल रहा है।

ट्रंप आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान से बेहद कड़ाई से निपटने के पक्षधर हैं। उन्होंने चुनावी भाषणों में खुल कर इस बारे में बात भी की है। ऐसे में अगर ट्रंप जीते तो भारत के पाकिस्तान और आतंकवाद विरोधी मुहिम को अतिरिक्त शक्ति हासिल होगी।

भारत के पड़ोसी चीन के मामले में हिलेरी-ट्रंप का रुख एक है, मगर यही बात रूस पर लागू नहीं होती जो कि भारत का सबसे भरोसेमंद देश है। हिलेरी हमेशा से रूस को सबक सिखाने की पक्षधर रही हैं, जबकि ट्रंप रूस के साथ मिल कर आगे आने के इच्छुक हैं।

ऐसे में हिलेरी की जीत से भारत उस समय असहज होगा जबकि मुद्दा विशेष पर उसे अमेरिका और रूस दोनों को साधने की जरूरत होगी। एक अन्य महत्वपूर्ण देश ईरान को ले कर दोनों उम्मीदवारों की स्थिति स्पष्ट नहीं है

जहां तक रोजगार की बात है तो इस मुद्दे पर हिलेरी की जीत भारत को राहत देगी। ट्रंप आईटी सहित विभिन्न क्षेत्रों में गैर अमेरिका वासियों के खिलाफ सख्ती के पक्षधर हैं। सभी को पता है कि आईटी क्षेत्र में अमेरिका में अपनी अलग पहचान बनाने वाले भारतीयों के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।

हालांकि बड़ी सच्चाई यह भी है कि इसकी शुरुआत ओबामा सरकार ने पहले ही कर दी थी। जाहिर तौर पर मुकाबला बेहद कड़ा है। जीत की भविष्यवाणी संभव नहीं तो उचित भी नहीं है। निष्कर्ष यह है कि हिलेरी-ट्रंप की हार जीत से दोनों देशों के रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला।

(हिमांशु मिश्र से बातचीत पर आधारित)
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