डीडीटी पाउडर निर्माता कंपनी हिंदुस्तान इंसेक्टिसाइड्स लिमिटेड (एचआईएल) गुणवत्तापूर्ण कीटनाशी के साथ प्रमाणित बीज और घुलनशील रासायनिक उर्वरकों का उत्पादन भी बढ़ा रही है। कंपनी ने डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) और म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) का आयात कर देश में उपलब्ध कराने की भी योजना बनाई है। कंपनी की भविष्य की रणनीति पर अमर उजाला के शिशिर चौरसिया ने एचआईएल के अध्यक्ष एवं एमडी एसपी मोहंती से बातचीत की। पेश है अंश :
प्रश्न- कृषि रसायनों की वजह से सैकड़ों किसानों की असमय मौत हो जाती है। इस दिशा में आप क्या कर रहे हैं?
उत्तर- आधिकारिक आंकड़ा है कि पिछले चार वर्षों में 273 किसानों और उनके यहां काम करने वाले मजदूरों की मौत कीटनाशी की वजह से हुई। इनमें प्रमुख कारण कीटनाशी दवाओं का अविवेकपूर्ण उपयोग, दवाओं के छिड़काव के वक्त लापरवाही और नकली कीटनाशी का उपयोग था। इससे न सिर्फ खेती की लागत बढ़ती है, बल्कि ठीक से फसलों को सुरक्षा भी नहीं मिल पाती है। उद्योग संगठन फिक्की की रिपोर्ट के अनुसार, देश में अभी लगभग 25 फीसदी कीटनाशी नकली बिक रहे है। इससे बचाव को हमने देश के सभी राज्यों में कृषक जागरूकता अभियान शुरू किया है। इसके तहत पिछले चार साल में कीटनाशी के उपयोग को लेकर एक लाख से अधिक किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है। साथ ही हम किसानों को समेकित कीट प्रबंध की जानकारी दे रहे हैं, ताकि वे कम कीटनाशी का उपयोग कर ज्यादा लाभ ले सके। प्रशिक्षण में हमने किसानों को एक किट भी निशुल्क दी है, जिसमें मास्क, चश्मा, एप्रन, टोपी आदि है। उसका उपयोग कैसे करना है, यह भी हमने सिखाया है।
प्रश्न- एचआईएल को लोग डीडीटी पाउडर से जोड़ कर देखते हैं। आज कंपनी की क्या विशेषज्ञता है?
उत्तर- यह सही है कि एचआईएल की स्थापना राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के तहत डीडीटी पाउडर बनाने के लिए हुई थी। लेकिन आज देखें तो हम किसानों के उपयोग की लगभग हर चीज बना रहे हैं। हम जन स्वास्थ्य, कृषि रसायन, बीज और उर्वरक क्षेत्र में काम कर रहे हैं। हम डीडीटी बनाने के साथ किसानों के लिए गुणवत्तापूर्ण कीटनाशी बना रहे हैं और दलहनी एवं तिलहनी फसलों के लिए प्रमाणित बीज उगा रहे हैं। हमने जल में घुलने वाले रासायनिक उर्वरकों का उत्पादन शुरू किया है और इस समय सीमा पर और दुर्गम इलाकों में तैनात जवानों केलिए रसयान युक्त मच्छरदानी भी बना रहे है, जिसके संपर्क में आते ही मच्छर मर जाते हैं। इस साल हम खेती में काम आने वाले उपकरणों (एग्री मशीनरी) के कारोबार में भी उतरेंगे।
प्रश्न- भारतीय किसान जल में घुलने वाले उर्वरकों को कम ही जानते हैं। इसकी क्या संभावना है?
उत्तर- भारतीय किसानों के बीच जल में घुलने वाले उर्वरकों की कम जानकारी हैं। वहीं, इस्राइल में 100 फीसदी इसी उर्वरक का इस्तेमाल होता है। भारतीय किसान खेतों में उर्वरक का छिड़काव करते हैं, जिसे मिट्टी और जड़ तक पहुंचाने के लिए तुरंत सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसमें करीब 30 फीसदी उर्वरक बह जाता है। घुलनशील उर्वरकों का छिड़काव मिट्टी के बजाय फसल के पत्ते और तने पर किया जाता है, जिससे 100 फीसदी उर्वरक पौधों में जाते हैं और फसल बेहतर होती है। इससे किसानों का पैसा बचने के साथ मिट्टी को भी कोई हानि नहीं होती है। जैसे-जैसे इसकी जानकारी किसानों के पास पहुंच रही है, इसकी मांग बढ़ रही है।
प्रश्न- अभी देश में इस तरह के उर्वरक की कितनी खपत है?
उत्तर- अभी देश में करीब 1.25 लाख टन घुलनशील उर्वरकों की मांग है, जिसमें से अधिकतर मांग आयात के जरिए पूरी होती है। हम इस समय हर साल 500 टन ऐसे उर्वरक बना रहे हैं, जिसे इसी साल छह गुना बढ़ाकर 3,000 टन करने की योजना है। हम दो तरह के एनपीके उर्वरक बनाते हैं। पहला 14:35:00 जिसमें नाइट्रोजन 14 फीसदी जबकि फास्फोरस 35 फीसदी और पोटाश शून्य होता है। वहीं, दूसरा 19:19.19 है, जिसमें तीनों की मात्रा बराबर है।
प्रश्न- आपने पारंपरिक रासायनिक उर्वरक कारोबर भी किया है। इसे भी बनाते हैं?
उत्तर- हम इस तरह के उर्वरक का उत्पादन नहीं करते बल्कि आयात कर अपने डीलर नेटवर्क के जरिए बेचते हैं। हमारे देश भर में 15,000 डीलर हैं, जहां से किसान हमारे सभी उत्पाद ले सकते हैं। इसका बेहतर उपयोग के लिए हम इस साल डीएपी और एमओपी का आयात कर अपने विपणन तंत्र के जरिए बेचेंगे।
प्रश्न- आपने विशेष प्रकार के मच्छरदानी का जिक्र किया है। यह क्या है?
उत्तर- हमने मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत एक रासायनिक मच्छरदानी का संयंत्र शुरू किया है, जिसके लिए हमें संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनिडो से फंडिंग मिली है। इसके धागे में ही कीटनाशी पड़ा है, जिसके संपर्क में आते ही मच्छर मर जाते हैं। हालांकि यह कीटनाशी मानवों के लिए सुरक्षित है। इस मच्छरदानी का उपयोग सीमा या दुर्गम इलाकों में तैनात सुरक्षा बल के जवान करते हैं और अभी तक इसका आयात होता था। सरकारी एजेंसियां भी इसका वितरण कुछ विशेष जिलों में करती हैं, जहां मलेरिया और कालाजार जैसे रोगों का प्रकोप ज्यादा है। इस मच्छरदानी का उपयोग तीन साल तक या 20 धुलाई (जो भी पहले हो) तक किया जा सकता है।
प्रश्न- अभी भी आप डीडीटी बना रहे हैं?
उत्तर- जी हां, हमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने वर्ष 2024 तक इसे बनाने की अनुमति दी है। अभी सालाना 3,000 टन डीडीटी का उत्पादन होता है। घरेलू उपयोग के साथ इसे कुछ अफ्रीकी देशों में भी निर्यात किया जा रहा है। केंद्र ने वर्ष 2030 तक मलेरिया के उन्मूलन का लक्ष्य तय किया है, इसे देखते हुए इसका उपयोग जारी है।