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निजी मेडिकल कॉलेजों की मंहगी फीस होनहार छात्रों को कर रही है MBBS से दूर

Sat, 21 Apr 2018 09:23 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भारत में एमबीबीएस की केवल 60 हजार सीटें हैं। मगर क्या आपने सोचा है कि फिर कैसे 4 लाख या उससे ज्यादा रैंक लाने वालों को मेडिकल में एडमिशन मिल जाता है। क्या वे सही मायनों में योग्य होते हैं? इसका जवाब है नहीं, यदि सभी कॉलेज नीट रैंकिंग को लागू करेंगे तो 4 लाख या उससे ज्यादा की रैकिंग वाले बच्चों को एडमिशन मिलना असंभव हो जाएगा लेकिन निजी कॉलेजों की मंहगी फीस ने इसे संभव कर दिया है। मंहगी फीस की वजह से अच्छी रैंकिंग लाने वाले बच्चे एडमिशन नहीं लेते हैं वहीं कम अंक लाने वालों को मेडिकल सीट मिल जाती है।

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पंजाब की बात करें तो वहां आठ कॉलेज बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंस के अंतर्गत, तीन कॉलेज सरकार के अंतर्गत और चार निजी कॉलेज हैं। जबकि एक निजी यूनिवर्सिटी है। निजी यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस की फीस 64 लाख रुपए है जबकि सरकारी कॉलेज में यही 4 लाख रुपए है। हालांकि सभी राज्यों का डाटा मौजूद नहीं है लेकिन यही पैटर्न हर जगह अपनाया जाता है। यहां तक कि निजी संस्थान में जो बच्चे सरकारी कोटे के तहत एडमिशन लेते हैं उनके नंबर अच्छे होते हैं वहीं निजी यूनिवर्सिटीज में बहुत कम अंक लाने वाले छात्रों को एडमिशन मिल जाते हैं। 

जहां सरकारी कोटे से निजी कॉलेज में एडमिशन लेने वाले छात्र के लिए 4 लाख रुपए फीस देनी होती है वहीं निजी यूनिवर्सिटीज में एक करोड़ के लगभग फीस चुकानी पड़ती है। निजी कॉलेज द्वारा ली जाने वाली ज्यादा फीस की वजह से मेडिकल मापदण्डों में कमी आ रही है। इसकी वजह से होनहार बच्चे जहां मेडिकल से दूरी बना रहे हैं वहीं कम अंक लाने वाले डॉक्टर बन रहे हैं। इसकी एक वजह साल 2016 के बाद से कट-ऑफ को 50 और 40 पर्सेंटाइल करना भी है। जिसकी वजह से नीट में 18-20 प्रतिशत अंक हासिल करने वालों के लिए भी मेडिकल कॉलेजों के दरवाजे खुल गए हैं।
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इस साल भी 20 प्रतिशत अंक लाने वालों को आराम से मेडिकल सीट मिल जाएगी। दरअसल साल 2015 में सामान्य श्रेणी के तहत एडमिशन पाने के लिए आपको 50 प्रतिशत अंक लाने होते थे। यानी 720 में से 360 अंक लाने जरूरी होते थे। मगर साल 2016 में आपको केवल 50 पर्सेंटाइल लाने थे इसका मतलब 720 में से केवल 145, जो कुल अंको का महज 20 प्रतिशत है। 

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