सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देश के सभी हाईकोर्ट से कहा है कि वे बेल (जमानत) याचिकाओं के नियमों में यह प्रावधान जोड़ने पर विचार करें कि आरोपी को अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का खुलासा करना जरूरी हो। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संजय करोल और संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश उस मामले में दिया, जिसमें राजस्थान हाईकोर्ट ने एक न्यायिक अधिकारी पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि उन्होंने हत्या की कोशिश के आरोपी को "बिना गंभीरता" से जमानत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने इन टिप्पणियों को हटा दिया है।
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पीठ ने कहा, 'हम मानते हैं कि देश के हर हाईकोर्ट को यह विचार करना चाहिए कि बेल याचिकाओं में आरोपी के पिछले आपराधिक मामलों की जानकारी देना जरूरी हो।' सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के नियमों का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां पहले से ही यह नियम है कि बेल याचिका में आरोपी को बताना होता है कि वह पहले किसी अपराध में शामिल रहा है या नहीं।
क्या था मामला?
एक आरोपी को एक न्यायिक अधिकारी ने बेल दी थी। बाद में शिकायतकर्ता ने इस पर आपत्ति जताई और उच्च न्यायालय से बेल रद्द करवा दी। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी पर सख्त टिप्पणी की कि उन्होंने गंभीर लापरवाही से बेल दी। इस पर न्यायिक अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में बिना अधिकारी को सफाई का मौका दिए इस तरह की टिप्पणी करना सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक फैसलों पर सवाल उठाना अलग बात है, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणी करना अनुचित है।
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क्या हुआ फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की टिप्पणियों को हटा दिया। इसके साथ ही सभी हाईकोर्टों को सुझाव दिया कि बेल याचिकाओं में आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी अनिवार्य की जाए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी सभी हाईकोर्टों के रजिस्ट्रार जनरल्स को भेजी जाएगी। यह आदेश न्यायिक पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है, जिससे अदालतों को आरोपी के बारे में पूरी जानकारी मिल सकेगी और बेल के फैसले सोच-समझकर लिए जा सकें।