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ये मोदी जी घर में क्यों नहीं टिकते

Mon, 06 Jun 2016 08:09 PM IST
वुसअतुल्लाह ख़ान /बीबीसी हिंदी के लिए
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modi - फोटो : BBC
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एक बात समझ में नहीं आती ये मोदी जी घर में क्यों नहीं टिकते? अब तो ये लगता है। कि जैसे एक देश से दूसरे देश जाते-जाते दिल्ली में भी उतर जाते है।
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चलिए आप एक स्वायत्त देश के स्वायत्त प्रधानमंत्री है। जहां चाहे जाएं। पर ये तो कोई बात ना हुई कि आप बहाने-बहाने से उन देशों में भी बार-बार चक्कर लगा रहे है। 

जिनका पाकिस्तान से कुछ ना कुछ टांका भिड़ा रहता है। जैसे फरवरी में आपने काबुल यात्रा की। चलिए ठीक है वहां आपको अफगान पार्लियामेंट की बिल्डिंग के तोहफे का फीता काटना था।
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अब आप फिर अफग़ानिस्तान पहुंच गए। हेरात में सलमा बांध का उद्घाटन करने। कल आप किसी सड़क की नींव का पत्थर रखने के बहाने पहुंच जाएंगे।

डेढ़ हफ्ते पहले ही तो आपकी तेहरान में राष्ट्रपति अशरफ गनी से भेंट हुई थी

modi - फोटो : BBC
अभी डेढ़ हफ्ते पहले ही तो आपकी तेहरान में राष्ट्रपति अशरफ गनी से भेंट हुई थी। क्या दिल नही भरा। हमारा तो उनसे बहुत पहले ही भर गया था।

मोदी जी कभी-कभी तो मुझे आप पाकिस्तान के संदर्भ में वे हिरोइन लगते है जो विलेन को जलाने के लिए बात-बेबात किसी भी फटीचर लौंडे के साथ कभी आइस्क्रीम खा रही है।
 
तो कभी पानी-पूड़ी सुड़क रही है। और थोड़ी-थोड़ी देर बाद विलेने को देखकर हंस भी लेती है। 

अच्छा ये बताएं क्या हमारे प्रधानमंत्री का दिल नही चाहता। कि वे काबुल यात्रा करें और वहां किसी प्रोजेक्ट का उद्घाटन करें।
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कभी शिकार के बहाने तो कभी बिना बहाने ही 'गुजरते हुए सोचा कि चक्कर लगा लूं' कहते हुए कहीं भी उतर जाते थे

modi - फोटो : BBC
क्या जनरल राहील शरीफ़ का दिल नहीं चाहता होगा कि वे भी ढाके जाकर शहीद मीनार पर फूल चढ़ाएं।

एक जमाना था। कि शाह विरेंद्र या तो काठमांडू में होते थे या फिर इस्लामाबाद आ जाते थे। 

कोलंबो वाले भी इतने फेरे नहीं लगाते थे जितने इस्लामाबाद वाले वहां के लगाते थे। और रजा शाह पहलवी तो कभी शिकार के बहाने तो कभी बिना बहाने ही 'गुजरते हुए सोचा कि चक्कर लगा लूं' कहते हुए कहीं भी उतर जाते थे।

 जैसे आप लाहौर में उतरे थे। पर वे हमारे अच्छे दिन थे। ये आपके अच्छे दिन है। भले जनता पर आए ना आए क्या फर्क पड़ता है। हमें इससे भी कोई आपत्ति नहीं कि आप अमरीकी कांग्रेस के ज्वाइंट सेशन को खिताब करे।

आप से पहले हमारे प्रधानमंत्री लियाकत अली खान, सदर अय्यूब खान और श्रीमती बेनज़ीर भुट्टो भी यही तमगा पा चुकी है।

बस एक मशविरा है और बड़े तजुर्बे का है। कहीं कैपिटल हिल पर कांग्रेस के ज्वाइंट सेशन के सामने जुबान से ये ना फिसल जाए कि भाइयों मैं काग्रेस का सफाया करने आया हूं।
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