राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के 2008 मालेगांव बम धमाके के मामले में 13 मई को साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और पांच अन्य के खिलाफ मकोका कानून के तहत लगाए गए आरोपों को हटाने की सिफारिश से कई प्रश्न उठ रहे हैं। क्या तथाकथित 'हिंदू आतंकवाद' केवल मुंबई एटीएस के अध्यक्ष हेमंत करकरे के दिमाग की उपज था? क्या करकरे पर हिंदुत्व से जु़ड़ी संस्थाओं को बदनाम करने के लिए उस समय की यूपीए सरकार दबाव डाल रही थी?
क्या ये पूरे हिन्दू समुदाय को बदनाम करने की कोई साजिश थी? आज अगर हेमंत करकरे जिंदा होते तो इन सवालों का जवाब वो दे सकते थे, लेकिन नवंबर 2008 के मुंबई चरमपंथी हमले में उनकी मौत ने इस मामले को पेचीदा बना दिया है। ये अलग बात है कि उनकी मौत के समय केंद्र और राज्य सरकारों और कई संस्थाओं ने ज़ोरशोर से उनकी शहादत की बात की थी और उनके साहस को सराहा था। बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस पर आरोपी लगाया है कि उस समय की 'यूपीए सरकार ने प्रज्ञा और अन्य अभियुक्तों को फंसाने की कोशिश की थी।' यानी इससे निष्कर्ष तो यही निकलता है कि हेमंत करकरे के नेतृत्व वाली एटीएस ने कांग्रेस सरकार के दबाव में आकर 'हिन्दू आतंकवाद का अविष्कार किया।'
लेकिन अब एनआईए की नई चार्जशीट में अभियुक्तों को क्लीन चिट देने पर मोदी सरकार पर भी यही आरोपी लगाया जा सकता है। और कांग्रेस पार्टी ऐसे आरोप लगा भी रही है। इस मुकदमे की सरकारी वकील रही रोहिणी सालियान ने सार्वजनिक तौर पर आरोप लगाया था कि एनआईए के एक अफसर ने उनपर मुकदमे की गति को धीमा करने का दबाव डाला था। उन्होंने इस बारे में अदालत को जानकारी भी दी थी। इसके बाद रोहिणी को सरकारी वकीलों के पैनल से हटा दिया गया था। पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी वेप्पला रामचंद्रन के अनुसार, 'उस समय के कई ऐसे कांड थे जिनसे लगता है कि हिन्दू आतंकवाद की बातें करकरे से पहले से ही शुरू हो चुकी थीं।'
मालेगांव धमाके में प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित की गिरफ़्तारी से पहले से ही हिन्दू आतंकवाद का नाम मीडिया में आने लगा था। पश्चिमी भारत में, खास तौर से महाराष्ट्र और गोवा में ऐसे धमाके हुए थे जिनका सुराग लगाना मुश्किल हो रहा था। इनमें से एक धमाका नांदेड़ में 6 अप्रैल 2006 के दिन हुआ था जिसमे दो लोगों की मौत हुई थी। ये धमाका बम बनाते समय बजरंग दल के एक कार्यकर्ता के घर में हुआ था।
सीबीआई ने इस केस में राकेश धावड़े नाम के एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किया था। राकेश धावड़े का नाम मालेगांव धमाके में भी आया। एनआईए की नई चार्जशीट में भी उसे क्लीन चिट नहीं दी गई है।
नवंबर 2008 में मैं नासिक गया था। तब तक एटीएस प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित समेत 10 लोगों को मालेगांव धमाके के सिलसिले में गिरफ़्तार कर चुका था। वहां मैंने आरएसएस से संबंधित भोंसले मिलिट्री अकादमी के अध्यक्ष से लेकर नासिक मठ के अध्यक्ष जैसे ज़िम्मेदार हिन्दू नेताओं से बातचीत की थी।
अदालत इस नई चार्जशीट को रद्द भी कर सकती है
साध्वी प्रज्ञा
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उन्होंने मुझसे शिकायत की थी कि मीडिया आतंकवाद से हिन्दू धर्म को जोड़ रहा है जो ठीक नहीं है। उनका कहना था कि अगर कुछ हिन्दू व्यक्ति कुछ धमाकों की साजिश में शामिल थे, तो उससे पूरे हिन्दू समाज और धर्म को क्यों जोड़ा जा रहा है? लेकिन तब भी किसी ने ये नहीं कहा था कि एटीएस हिन्दू धर्म को बदनाम करने की साज़िश कर रहा है। कर्नल पुरोहित ने प्रधानमंत्री मोदी से अपने निर्दोष होने को लेकर गुहार लगाई थी। सच क्या है ये शायद कभी बाहर न आ सके। अदालत पर निर्भर है कि वो पुरानी चार्जशीट पर मुकदमा चलाती है या नई चार्जशीट के मुताबिक।
अब ये फैसला मुंबई की उस विशेष अदालत के हाथ में है जहाँ मालेगांव बम धमाके का मुकदमा चल रहा है।वरिष्ठ वकील मजीद मेमन कहते हैं, 'इस अदालत पर एक बड़ा नैतिक दबाव है। कानूनी परंपरा ये है कि अदालत नई चार्जशीट को स्वीकार कर लेती है।' लेकिन ये एक अहम मुकदमा है इसलिए मजीद मेमन के अनुसार, अदालत दोनों चार्जशीट का ठीक से अध्ययन करने के बाद ही कोई फैसला सुनाएगी। पहली चार्ज शीट 5000 पन्नों की है जबकि एनआईए की चार्जशीट उसकी आधी से भी कम है। 'करकरे को किसने मारा' नाम की पुस्तक लिखने वाले महाराष्ट्र के एक पूर्व पुलिस अधिकारी एसएम मुशरिफ के अनुसार एनआईए की चार्जशीट में एक भारी गड़बड़ी है।
वो कहते हैं, 'पंचनामे में गवाही केवल स्पॉट पर मौजूद गवाहों की ही ली जाती है। उनसे दोबारा गवाही लेने का अधिकार एनआईए को नहीं है। एनआईए ने इन गवाहों की दोबारा गवाही ली है, जो वो नहीं कर सकती है। अदालत इस नई चार्जशीट को रद्द भी कर सकती है।'एनआईए की आलोचना के बाद उसने अपने बचाव में कहा है कि नई चार्जशीट एटीएस की चार्जशीट से ज़्यादा अलग नहीं है। तीन पन्नों वाली इसकी एक रिपोर्ट में लिखा है कि नई चार्जशीट में 10 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ केस जारी रखने की सिफारिश की गई है जिसमें कर्नल पुरोहित शामिल हैं जबकि प्रज्ञा समेत पांच लोगों के खfलाफ सबूत न होने के आधार पर केस खारिज करने की सिफारिश की गई है।
मुशरिफ कहते हैं कि एटीएस ने प्रज्ञा के खिलाफ तीन मुख्य आरोप लगाए थे जिन्हें एनआईए ने बेबुनियाद बताया है। वो कहते हैं, "करकरे ने जो एविडेंस जुटाए हैं उन्हें ख़त्म करना आसान नहीं होगा। इस केस में दिक्कत ये है कि मुल्जिम और प्रॉसिक्यूशन एक ही पक्ष के हैं।' ऐसे में इस मुक़दमे से जुड़े वो लोग जो एनआईए की जांच से खुश नहीं हैं, वो ऊपर की अदालत का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं। वो अदालत की निगरानी में इस पूरे मामले की दोाबरा से जांच की मांग भी कर सकते हैं।