2050 तक देश के उत्तर-पश्चिम में चलने वाली लू (हीटवेव) में 400 से 700 फीसदी की वृद्धि हो सकती है। केंद्र सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन महामना सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन क्लाइमेट चेंज रिसर्च की तरफ से किए गए एक अध्ययन में मध्य अवधि (2041-2060) और दीर्घकालिक (2081-2099) के लिए भारत में हीटवेव में भविष्य में होने वाले बदलावों का विश्लेषण किया गया।
इस दौरान रिप्रेजेंटेटिव कॉन्सनट्रेशन पाथवे (आरसीपी) 4.5 और 8.5 परिदृश्यों के आधार पर निकले नतीजों में देश में हीटवेव की तीव्रता और बारंबारता में भारी इजाफा होगा।
आरसीपी का उपयोग मानव गतिविधियों की वजह से भविष्य में वायुमंडल में होने वाले ग्रीनहाउस गैसों के जमाव के आकलन के लिए किया जाता है। आरसीपी 4.5 की स्थिति में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन सदी के मध्य में चरम पर होगा और सदी के अंत में गिरावट शुरू हो जाएगी, जबकि आरसीपी 8.5 की स्थिति बनने पर उत्सर्जन पूरी सदी में बढ़ता रहेगा।
क्या कहता है अध्ययन
अध्ययन के मुताबिक, आरसीपी 4.5 की स्थिति में मध्यावधि और दीर्घकालिक हीटवेव आवृत्ति में 400 से 700 फीसदी की वृद्धि होगी, जबकि आरसीपी 8.5 तक बढ़ने पर 500 से 1000 फीसदी तक वृद्धि हो सकती है। उत्तर-पश्चिमी, मध्य और दक्षिण-मध्य भारत में हीटवेव के हॉटस्पॉट बनकर उभरेंगे।
यह अनुमान मानव स्वास्थ्य, कृषि और बुनियादी ढांचे पर संभावित प्रभावों को कम करने के लिए परिवर्तनकारी नीतियों और अनुकूलन उपायों को विकसित करने के अहम साबित होगा।
भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोगकर्ता
भारत भूजल का दुनिया का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। यहां संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के संयुक्त उपयोग से अधिक भूजल का उपयोग होता है। भारत का उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र देश के बढ़ते 1.4 अरब लोगों के लिए रोटी की टोकरी के रूप में कार्य करता है। इसमें पंजाब और हरियाणा देश की चावल आपूर्ति का 50 प्रतिशत और गेहूं का 85 प्रतिशत उत्पादन करते हैं। हालांकि, पंजाब में 78 प्रतिशत कुओं का सीमा से अधिक दोहन हो चुका है और पूरे उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में 2025 तक भूजल की उपलब्धता गंभीर रूप से कम होने का अनुमान है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के मुताबिक भारत में अगले तीन दशक में दुनिया के किसी भी देश या क्षेत्र की तुलना में सबसे ऊर्जा मांग पैदा होने वाली है। बढ़ी हुई गर्मी से निपटने के लिए सिर्फ घरेलू एयर कंडीशनर चलाने के लिए ही भारत की बिजली की मांग 2050 तक नौ गुना तक बढ़ जाएगी, जो आज के पूरे अफ्रीका की कुल बिजली खपत से ज्यादा होगी।