बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को महाराष्ट्र सरकार से जानना चाहा कि क्या राज्य में आदिवासी आबादी को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम (मनरेगा) के तहत रोजगार दिया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एम एस कार्णिक की खंडपीठ 2007 में राज्य के मेलघाट क्षेत्र में कुपोषण के कारण बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की मृत्यु की बड़ी संख्या को उजागर करने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
राज्य की ओर से पेश हुए महाधिवक्ता आशुतोष कुंभकोनी ने गुरुवार को अदालत को सूचित किया कि मेलघाट क्षेत्र में जनजातीय आबादी के लिए सरकारी कल्याणकारी योजनाएं उपलब्ध थीं, लेकिन जब वे मानसून के मौसम के बाद अन्य क्षेत्रों में प्रवास करते हैं तो यह उपलब्ध नहीं थी। इसके बाद इन व्यक्तियों को योजना का लाभ मिलने में रुकावट आती है। हमारा अंतिम उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई पलायन न हो।
इस पर पीठ ने कहा कि अगर आदिवासी आबादी को उनके ही गांवों में रोजगार मुहैया कराया जाता है तो उन्हें पलायन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्या उन्हें मनरेगा योजना के तहत नौकरी दी जा सकती है? अगर आप पलायन को रोकना चाहते हैं तो आपको रोजगार के स्रोत तलाशने होंगे। मुख्य न्यायाधीश दत्ता ने कहा कि यह आपकी योजना का हिस्सा होना चाहिए।