झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में से हजारीबाग इस बार सभी की निगाह में है। वजह है, यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा। 2014 में यहां से जीते जयंत मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री बने। दूसरी ओर, उनके सामने कांग्रेस के गोपाल साहू और भाकपा के भुवनेश्वर प्रसाद मेहता मैदान में हैं। पिछले चुनाव में मुकाबला भाजपा, कांग्रेस और ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (एजेएसयू) के बीच त्रिकोणीय था। इस बार भाजपा और एजेएसयू के साथ आने से मुकाबला एनडीए बनाम कांग्रेस गठबंधन हो गया है। यहां 16 प्रत्याशी मैदान में हैं।
पांचवें चरण के मतदान में जयंत तीसरे सबसे अमीर प्रत्याशी हैं, उनकी संपत्ति 77 करोड़ रुपये है। बीते वित्तीय वर्ष में उन्होंने पांच करोड़ रुपये कमाए जो इस चरण के प्रत्याशियों में सर्वाधिक थे। जयंत क्षेत्र में किए विकास कार्यों को अपनी मजबूती मानते हैं। वहीं, कांग्रेस ने गोपाल साहू को मैदान में उतारा है।
कांग्रेस महागठबंधन के तहत झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। पिछले चुनाव में इस सीट पर जेवीएम को 30 हजार वोट मिले थे। साहू के चयन के पीछे कांग्रेस द्वारा वैश्य समुदाय के वोट हासिल करने का तर्क दिया जा रहा है। 2004 में इस सीट से भाकपा ने जीत हासिल की थी, लेकिन बीते चुनाव में उसे 3.14 प्रतिशत ही वोट मिले। ब्यूरो
इसलिए फायदे में दिख रही भाजपा
2014 में यहां से जयंत सिन्हा को 4.06 लाख वोट मिले थे। दूसरे स्थान पर रहे कांग्रेस के सौरभ नारायण सिंह को 2.47 लाख और तीसरे स्थान पर रहे ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (एजेएसयू) के लोकनाथ महतो को 1.56 लाख वोट मिले थे। इस बार एजेएसयू ने प्रत्याशी नहीं उतारकर भाजपा को समर्थन दिया है। इससे जयंत की राह आसान हो गई है।
भूमि अधिग्रहण है बड़ा मुद्दा
हजारीबाग में कोयला खदानों के लिए होने वाला भूमि अधिग्रहण प्रमुख मुद्दा है। कई बार ग्रामीण अधिग्रहण के लिए डराने-धमकाने की शिकायत कर चुके हैं। वहीं, पैसा भी जमीनों की कीमत के अनुरूप नहीं दिया गया। कई गांवों को इन खदानों के कारण विस्थापित किया गया है, लेकिन 28 से अधिक गांवों में हुए अधिग्रहण के दौरान जमीन की कीमतें 10 गुना तक कम दी गईं।
1984 के बाद हजारीबाग से कभी नहीं जीती कांग्रेस
1957 से अस्तित्व में आई इस सीट पर पहले चुनाव में छोटा नागपुर संथाल परगना जनता पार्टी ने जीत हासिल की। फिर स्वतंत्र पार्टी, निर्दलीय, जनता पार्टी और भाकपा जीतीं। छह बार यह सीट भाजपा और दो बार कांग्रेस के पास रही। कांग्रेस ने आखिरी बार यहां 1984 में जीत हासिल की थी। बीते आठ चुनाव में से छह बार यहां भाजपा जीती है और दो बार भाकपा।