केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के विरोध में जब संयुक्त किसान मोर्चा ने पूरे देश में आंदोलन किया था, तब लोगों ने इसका समर्थन किया था। यूपी बॉर्डर, शंभू बॉर्डर सहित तमाम जगहों पर लंबी सड़क बंदी से लोगों को आने-जाने में भारी परेशानी हुई। लेकिन इसके बाद भी काफी हद तक लोगों का समर्थन किसानों के साथ बना रहा। लोगों ने यह माना कि किसानों की समस्याएं गंभीर हैं और उसका समाधान होना चाहिए। संभवतः आंदोलन को मिले इसी समर्थन के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्वयं सामने आकर उन कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा।
लेकिन आज जब पंजाब की भगवंत मान सरकार ने किसानों का आंदोलन समाप्त करने की कार्रवाई की है, लोग उसके समर्थन में दिख रहे हैं। पंजाब सरकार ने लगभग 800 किसानों को गिरफ्तार कर लिया है। शंभू बॉर्डर से उनका धरना समाप्त करवा दिया गया है। कहा जा रहा है कि कई बड़े किसान नेताओं को सरकार ने नजरबंद कर दिया है। किसानों के प्रति जनता के रुख में यह बदलाव कैसे और क्यों आया?
देश की लगभग 55 प्रतिशत लोग आज भी किसानी से जुड़े हैं। देश के 42 से 60 प्रतिशत लोग आज भी कृषि से जुड़े विभिन्न व्यवसायों में काम कर रहे हैं। देश की बड़ी आबादी के लिए यह आज भी आजीविका का सबसे बड़ा साधन है। लेकिन इसके बाद भी किसानों के आंदोलन को बड़ा समर्थन न मिल पाना चौंकाता है।
ध्यान देने की बात है कि जिस समय किसान आंदोलन चल रहा था, उसी समय पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हुए थे। भाजपा, जिसके खिलाफ किसान आंदोलन कर रहे थे, उसने यूपी-उत्तराखंड सहित चार राज्यों में बड़ी जीत हासिल करने में कामयाब रही थी। यहां तक कि लखीमपुर खीरी में जहां एक मंत्री पुत्र के कारण बड़ी दुर्घटना घट गई थी और कुछ किसानों की जान चली गई थी, वहां भी भाजपा बड़ी जीत हासिल करने में सफल रही थी। इससे भी यही संकेत गया था कि किसानों के मुद्दे अपनी जगह हैं, लेकिन बड़ी आबादी दूसरे मुद्दों पर भाजपा के साथ खड़ी थी।
राजनीति में कूदे किसान, विश्वसनीयता घटी
गुरनाम सिंह चढ़ूनी जैसे कई किसान नेताओं ने बाद में स्वयं राजनीति में किस्मत आजमाने की कोशिश की। उनका मानना था कि यदि राजनीतिक दलों का साथ देकर वे अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रहे हैं तो इससे बेहतर वे जनता के बल पर स्वयं राजनीति में उतरें और विधानसभा और संसद में पहुंचकर किसानों के लिए कानून बनाएं। हालांकि, गुरनाम सिंह चढ़ूनी सहित सभी किसान नेता राजनीति में असफल रहे, लेकिन उनकी जनता के बीच विश्वसनीयता पर जबरदस्त असर पड़ा।
जो किसान नहीं, वे नेता बने- सरदार वीएम सिंह
किसानों के बड़े नेता सरदार वीएम सिंह ने कहा कि यह सच है कि किसानों के आंदोलन को लेकर जनता के बीच शुरुआती दौर में जो समर्थन दिख रहा था, वह अब नहीं दिखाई देता। उनके अनुसार, इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जो लोग स्वयं किसान नहीं हैं, स्वयं किसानी नहीं करते हैं, वही लोग अब किसानों के सबसे बड़े नेता बन गए हैं। वीएम सिंह के अनुसार, ऐसे किसान नेता इन आंदोलनों की आड़ में अपनी निजी राजनीति को आगे बढ़ाते रहे जिसके कारण जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता कम हुई। आज उसी का परिणाम है कि किसानों पर कार्रवाई होने के बाद भी उनके प्रति जनता के बीच कोई समर्थन नहीं दिख रहा है।
सरदार वीएम सिंह ने कहा कि किसानों का आंदोलन इसलिए फेल हो रहा है क्योंकि उन्होंने सरकारों के राजनीतिक संरक्षण में आंदोलन शुरू किया था। पहले पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार ने भाजपा और आम आदमी पार्टी से राजनीतिक स्कोर सेटल करने के लिए किसानों के आंदोलन को समर्थन दिया और उन्हें हर तरह की मदद पहुंचाई। बाद में आम आदमी पार्टी ने किसान आंदोलन को समर्थन देकर उसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की।
उनके अनुसार, जब राजनीतिक दलों और सरकारों के सहयोग से आंदोलन चलते हैं तो अपना काम निकलने के बाद राजनीतिक दल और सरकारें उनका समर्थन करना बंद कर देती हैं। यही कारण है कि किसानों के ऊपर से लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है। हालांकि, उन्होंने कहा कि उन्होंने जो भी आंदोलन किए, जनता का उन्हें खूब साथ मिला क्योंकि उन्होंने हमेशा किसानों का मुद्दा उठाया।
किसानों के मुद्दे कम गंभीर नहीं- ABKMS
अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के महासचिव डॉ. आशीष मित्तल ने अमर उजाला से कहा कि इसी सरकार ने जब तीन विवादित कृषि कानून लाया था, तब देश में सबसे पहले अरविंद केजरीवाल की सरकार ने सबसे पहले 3 दिसंबर 2020 को दिल्ली विधानसभा में इसे पास करने का काम किया था। इसका आशय साफ था कि वे किसानों के मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ खड़े थे। केंद्र सरकार पहले ही किसानों के आंदोलन के साथ नहीं थी। उनका आरोप है कि भगवंत मान सरकार ने केंद्र सरकार से हाथ मिलाते हुए किसानों को हटाने का काम किया है।
डॉ. आशीष मित्तल ने कहा कि किसानों की समस्याएं आज भी समाप्त नहीं हुई हैं। किसान कर्ज के जाल में फंसा है। उनके अनुसार, केंद्रीय वित्त मंत्री ने स्वयं वर्तमान बजट सत्र में यह जानकारी दी है कि सरकार ने उद्यमियों का 16 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कर्जमाफी की है, लेकिन यही सरकार किसानों का कर्ज माफ करने के लिए तैयार नहीं है। किसानों को कर्ज से मुक्त करने की बजाय उन्हें तरह-तरह से कर्ज लेने के लिए उकसाया जा रहा है जिससे उनकी स्थिति और अधिक संकट में फंसती जा रही है।
उन्होंने कहा कि किसानों को उनकी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने के मामले पर आज भी केंद्र सरकार का रुख साफ नहीं है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से कई दौर की वार्ताओं के बाद भी अभी तक केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट नहीं है। चार मई को अगले दौर की बातचीत होनी है।
किसान नेता ने कहा कि यह केवल किसानों का मामला नहीं है। देश की एक बड़ी आबादी को जीने के योग्य रोजगार के अवसर देने और उन्हें सम्मान से जीवन जीने देने का मामला है। स्वयं केंद्र सरकार को इसकी पहल करनी चाहिए क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता है तो हमारे देश की बड़ी आबादी के सामने रोजगार और खाद्यान्न का संकट पैदा हो जाएगा।
कांग्रेस ने दिया समर्थन
आप सरकार ने किसानों को हटा दिया है। लेकिन कांग्रेस और राहुल गांधी ने खुलकर किसानों का साथ देने की बात कही है। राहुल गांधी ने कहा है कि किसान देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उनका सम्मान होना चाहिए और उनकी वाजिब मांगों को माना जाना चाहिए। अखिल भारतीय किसान कांग्रेस ने भगवंत मान सरकार द्वारा किसानों पर कार्रवाई की निंदा की है।
अखिल भारतीय किसान कांग्रेस के उपाध्यक्ष अखिलेश शुक्ला ने कहा कि किसानों के एक वर्ष से ज्यादा शांतिपूर्ण आंदोलन को आम आदमी पार्टी सरकार ने बल प्रयोग करके समाप्त किया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। अखिल भारतीय किसान कांग्रेस के नेशनल कोऑर्डिनेटर एवं प्रवक्ता प्रबल प्रताप शाही ने कहा कि एक तरफ केंद्र सरकार किसानों से बातचीत कर रही है, वहीं दूसरी ओर पंजाब पुलिस से किसानों को गिरफ्तार कराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और पंजाब सरकार को किसानों की समस्याओं का समाधान करना चाहिए।