प्रदेश में विपक्षी दल बिखराव की राह पर चल पड़े हैं। किसी समय में मजबूत जनाधार रखने वाली इनेलो का अब विभाजन हो चुका है। इस पार्टी के अधिकांश विधायक भाजपा या कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। विभाजन के बाद अस्तित्व में आई जननायक जनता पार्टी भी अपनी अलग ढपली बजा रही है। बसपा, जिसने 2014 के विधानसभा चुनाव में चार फीसदी वोट लिए थे, इस बार उसका किसी दल के साथ समझौता नहीं हुआ है। आम आदमी पार्टी, जिसने पिछले साल हरियाणा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान किया था, आज वह भी चुपके से अकेले ही मैदान में उतरी है।
योगेंद्र यादव की पार्टी स्वराज इंडिया ने भी अपने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है। रही बात कांग्रेस पार्टी की तो वह मुकाबले में होने का दावा कर रही है, लेकिन धरातल पर अभी वह इस सच्चाई से कोसों दूर है। भाजपा नेता सतीश नांदल कहते हैं कि विपक्ष पूरी तरह से धराशायी हो चुका है। भाजपा इस चुनाव में न केवल 75 से ज्यादा सीटें जीतेगी, बल्कि इस बार विपक्ष के कद्दावर नेता भी चुनाव हारते दिखेंगे।
सोनिया गांधी ने कांग्रेस पार्टी की कमान संभालने के बाद प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक तंवर को हटा दिया था। उनकी जगह पर कुमारी शैलजा को प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया। पार्टी ने यह कदम तब उठाया, जब पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा बागी बनने की राह पर निकल चुके थे। उन्होंने रोहतक रैली में कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली को लेकर टिप्पणी भी कर दी थी। इसके अलावा उन्होंने प्रदेश में चार डिप्टी सीएम के पद बनाने की बात कही। हालांकि उन्होंने यह व्यवस्था खुद के मुख्यमंत्री होने की स्थिति में लागू करने का भरोसा दिलाया था।
प्रदेश की राजनीति में सर्वाधिक दखल रखने वाला जाट समुदाय अब बिखराव की ओर जा रहा है। राजनीति के जानकार चंद्रप्रकाश बताते हैं कि 2016 के आरक्षण आंदोलन के बाद राजनीतिक दलों ने जाट और गैर जाट समुदाय में एक बड़ी खाई पैदा कर दी थी। इस खाई का असर लोकसभा चुनाव के नतीजों के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि इस नए जातीय समीकरण का फायदा केवल भाजपा को पहुंचा है। जाट वोट बैंक, जिसे पहले इनेलो के पाले में माना जाता था, अब वह क्षेत्र के अनुसार बंट गया है। जैसे रोहतक, सोनीपत, झज्जर के जाट मतदाता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पक्ष में खड़े नजर आते हैं, तो वहीं सिरसा, जींद, हिसार, कैथल, नरवाना, भिवानी, कुरुक्षेत्र के जाट वोटरों का झुकाव इनेलो की ओर रहा है।
दूसरी तरफ गैर जाट वोटर हैं जो पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में आ चुके हैं। इसमें बसपा का वोटबैंक भी शामिल है। लोकसभा चुनाव के बाद बड़े स्तर पर इनेलो व दूसरी पार्टियों के जाट नेता भाजपा में शामिल हो गए हैं। विधानसभा चुनाव में इसका फायदा भाजपा को मिलना तय है। प्रदेश में जाट वोटरों की तादाद करीब 23 प्रतिशत बताई जाती है।
इनेलो का बिखराव हो चुका है और कांग्रेस पार्टी में फूट चल रही है। दूसरी पार्टियां, जिनमें जजपा, बसपा, स्वराज इंडिया और आम आदमी पार्टी शामिल हैं, इनके पास मजबूत प्रत्याशियों का अभाव है। भाजपा नेताओं का कहना है कि लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश का ऐसा कोई दल नहीं बचा है, जिसके बड़े नेताओं ने भाजपा में आने का प्रयास न किया हो। दर्जनों पूर्व मंत्रियों और विधायकों को भाजपा ज्वाइन भी कराई गई है, मगर अभी तक लाइन लगी है।
जिला स्तर की बात करें तो हजारों नेता भाजपा में आ चुके हैं। दूसरी पार्टियों के पास अब चुनाव लड़ाने के लिए उम्मीदवारों का टोटा पड़ गया है। कांग्रेस पार्टी, जिसके पास कुछ मजबूत उम्मीदवार हैं, लेकिन उनकी आपसी फूट उन्हें चुनाव जीतने देगी, ऐसा कम ही नजर आता है। इन सब स्थितियों का भाजपा चुनावी फायदा उठा सकती है।
भाजपा ने चुनाव में अनुच्छेद 370 के खात्मे को मुख्य मुद्दा बनाएगी। कई मुद्दों पर पाकिस्तान के खिलाफ कूटनीतिक जीत और बॉर्डर विवाद भी चुनाव में देखने को मिलेंगे। इसके अलावा प्रदेश स्तर के मुद्दों में खासतौर पर नौकरियों में पारदर्शिता को लेकर भाजपा लोगों के बीच जाएगी। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष सुभाष बराला कहते हैं कि हमारे कार्यकाल में इतने काम हो गए है कि उन्हें गिनाना भी संभव नहीं है। अगर कुछ अहम कामों का जिक्र करें तो उसमें तबादला नीति, ईमानदारी के आधार पर नौकरियां देना, भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति, हर खेत तक पानी पहुंचना और विभिन्न सरकारी विभागों, जहां पहले लाइन लगती थी, अब वहां सारा सिस्टम बदल दिया गया है।
अब नौकरी के लिए न पर्ची की जरुरत है और न ही रुपयों की। मेरिट के आधार पर नौकरी मिली हैं, यह बात खुद जनता कहती है। दूसरी ओर कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल बेरोजगारी, खेती किसानी, पानी की समस्या और मौजूदा सरकार द्वारा किए गए वादे पूरे न करने को लेकर चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी हो रही है।