फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गुरमेहर ने कहा, मैं अपने पापा की बेटी, 'आपके शहीद' की बेटी नहीं

Wed, 12 Apr 2017 09:16 AM IST
बीबीसी हिन्दी
विज्ञापन
गुरमेहर कौर
विज्ञापन
सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो को लेकर चर्चा में आईं गुरमेहर कौर ने एक बार फिर कुछ कहा है। उन्होंने मंगलवार को टिे्वटर पर अपने ब्लॉग का लिंक शेयर किया जो दो दिन पहले लिखा गया है।
विज्ञापन
गुरमेहर ने लिखा, "आपने मेरे बारे में पढ़ा है, लेखों के अनुसार अपनी राय बनाई है। अब मैं अपने बारे में अपने शब्दों में बता रही हूं। मेरा पहला ब्लॉग जिसका शीर्षक है 'आई ऐम'।" गुरमेहर ने अपने ब्लॉग में क्या कुछ लिखा है, आप भी पढ़िए:

मैं कौन हूं?

यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब मैं कुछ हफ्ते पहले तक अपने हंसमुंख अंदाज में बिना किसी हिचकिचाहट या परवाह के दे सकती थी लेकिन अब मैं पक्के तौर पर ऐसा नहीं कह सकती। क्या मैं वो हूं जो ट्रोल्स मेरे बारे में सोचते हैं? क्या मैं वैसी हूं जैसा चित्रण मेरा मीडिया में होता है? क्या मैं वो हूं जो सिलेब्रिटीज़ मेरे बारे में सोचते हैं? नहीं, मैं इनमें से कोई नहीं हो सकती। अपने हाथों में प्लेकार्ड लिए, भौंहे चढ़ाए हुए और मोबाइल फोन के कैमरे पर टिकी आंखों वाली जिस लड़की को आपने टेलीविज़न स्क्रीन पर फ्लैश होते देखा होगा, वह निश्चित तौर पर मुझ सी दिखती है। उसके विचारों की उत्तेजना जो उसके चेहरे पर चमकती है, निश्चित तौर पर उनमें मेरी झलक है। वह उग्र लगती है, मैं उससे भी सहमत हूं लेकिन 'ब्रेकिंग न्यूज़ की सुर्खियों' ने एक दूसरी ही कहानी सुनाई. मैं वो सुर्खियां नहीं हूं।

शहीद की बेटी

शहीद की बेटी शहीद की बेटी शहीद की बेटी मैं अपने पिता की बेटी हूं। मैं अपने पापा की गुलगुल हूं। मैं उनकी गुड़िया हूं। मैं दो साल की वह कलाकार हूं जो शब्द तो नहीं समझती लेकिन उन तीलियों की आकृतियां समझती है जो उसके पिता उसे पुकारने के लिए बनाया करते थे। मैं अपनी मां का सिरदर्द हूं। राय रखने वाली, बेतहाशा और मूडी बच्ची, जिनमें मेरी मां की भी छाया है। मैं अपनी बहन के लिए पॉप कल्चर की गाइड हूं और बड़े मैचों से पहले बहस करने वाली उसकी साथी। मैं क्लास में पहली बेंच पर बैठने वाली वो लड़की हूं जो अपने शिक्षकों से किसी भी बात पर बहस करने लगती है, क्योंकि इसी में तो साहित्य का मज़ा है. मुझे उम्मीद है कि मेरे दोस्त मुझे पसंद करते हैं। वे कहते हैं कि मेरा सेंस ऑफ ह्यूमर ड्राई है लेकिन चुनिंदा दिनों में यह कारगर भी है। किताबें और कविताएं मुझे राहत देती हैं।

रोजाना चुकाती हूं कीमत

मुझे किताबों का शौक है। मेरे घर की लाइब्रेरी किताबों से भरी पड़ी है और पिछले कुछ महीनों से मैं इसी फिक्र में हूं कि मां को उनके लैंप और तस्वीरें दूसरी जगह रखने के लिए मना लूं, ताकि मेरी किताबों के लिए शेल्फ में और जगह बन सके। मैं आदर्शवादी हूं। ऐथलीट हूं। शांति की समर्थक हूं। मैं आपकी उम्मीद के मुताबिक उग्र और युद्ध का विरोध करने वाली बेचारी नहीं हूं। मैं युद्ध इसलिए नहीं चाहती क्योंकि मुझे इसकी क़ीमत का अंदाज़ा है। ये क़ीमत बहुत बड़ी है। मेरा भरोसा करिए, मैं बेहतर जानती हूं क्योंकि मैंने रोज़ाना इसकी क़ीमत चुकाई है। आज भी चुकाती हूं। इसकी कोई क़ीमत नहीं है। अगर होती तो आज कुछ लोग मुझसे इतनी नफ़रत न कर रहे होते। न्यूज़ चैनल चिल्लाते हुए पोल करा रहे थे, "गुरमेहर का दर्द सही है या ग़लत?" हमारी तक़लीफों का क्या मोल है? अगर 51% लोग सोचते हैं कि मैं ग़लत हूं तो मैं ज़रूर गलत होऊंगी। इस स्थिति में भगवान ही जानता है कि कौन मेरे दिमाग को दूषित कर रहा है।

मैं आपके 'शहीद की बेटी' नहीं हूं

पापा मेरे साथ नहीं हैं; वह पिछले 18 सालों से मेरे साथ नहीं है। 6 अगस्त, 1999 के बाद मेरे छोटे से शब्दकोश में कुछ नए शब्द जुड़ गए- मौत, पाकिस्तान और युद्ध। ज़ाहिर है, कुछ सालों तक मैं इनका छिपा हुआ मतलब भी नहीं समझ पाई थी। छिपा हुआ इसलिए कह रही हूं क्योंकि क्या किसी को भी इसका मतलब पता है? मैं अब भी इनका मतलब ढूंढने की कोशिश कर रही हूं। मेरे पिता एक शहीद हैं लेकिन मैं उन्हें इस तरह नहीं जानती। मैं उन्हें उस शख्स के तौर पर जानती हूं जो कार्गो की बड़ी जैकेट पहनता था, जिसकी जेबें मिठाइयों से भरी होती थीं। मैं उस शख्स को जानती हूं जो मेरी नाक को हल्के से मरोड़ता था, जब मैं उसका माथा चूमती थी। मैं उस पिता को जानती हूं जिसने मुझे स्ट्रॉ से पीना सिखाया, जिसने मुझे च्यूइंगम दिलाया। मैं उस शख्स को जानती हूं जिसका कंधा मैं जोर से पकड़ लेती थी ताकि वो मुझे छोड़कर न चले जाएं। वो चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए। मेरे पिता शहीद हैं। मैं उनकी बेटी हूं। लेकिन, मैं आपके 'शहीद की बेटी' नहीं हूं। गुरमेहर दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ती हैं। 22 फ़रवरी, 2017 को उन्होंने फ़ेसबुक पर अपनी प्रोफ़ाइल पिक्चर बदली थी।
विज्ञापन

पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा, बल्कि जंग ने मारा है

इसमें गुरमेहर एक पोस्टर के साथ दिखी थीं। इस पर लिखा था, "मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा हूं। मैं एबीवीपी से नहीं डरती। मैं अकेली नहीं हूं। भारत का हर छात्र मेरे साथ है। #StudentsAgainstABVP" इसके बाद सोशल मीडिया पर कई छात्र-छात्राओं ने #StudentsAgainstABVP के हैशटैग के साथ ऐसा ही संदेश लिखकर अपनी तस्वीर डालनी शुरू की। लेकिन बवाल इस पर नहीं हुआ। हंगामा मचा गुरमेहर की उस तस्वीर पर जिसमें वो एक प्लेकार्ड लिए खड़ी हैं। इस पर अंग्रेज़ी में लिखा है, "पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा, बल्कि जंग ने मारा है।" ये हाल का नहीं, बल्कि साल भर पहले अप्रैल महीने का है। दरअसल, ये यूट्यूब पर वायरल हुए उस वीडियो का हिस्सा है, जिसमें गुरमेहर ने बिना कुछ बोले अपनी कहानी बताई थी। उनकी तस्वीर को लेकर ख़ासा हंगामा हुआ था जिसके बाद गुरमेहर ने मीडिया से दूरी बना ली थी। अब वे अपने ब्लॉग के साथ सामने आई हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें