प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कच्छ की सभाओं में बार-बार वहां के चर्चित रण उत्सव का ज़िक्र किया। उन्होंने हर जगह ये बात बताई कि 2001 के भूकंप के बाद भुज और अंजार के साथ-साथ कच्छ को उनकी सरकार ने कैसे नया जीवन दिया, कैसे इस पूरे इलाके को पर्यटन, उद्योग धंधे और खेती के लिहाज़ से समृद्ध बनाया, कैसे कच्छ के सफ़ेद रण को दुनिया के नक्शे में मशहूर कर दिया।
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अमर उजाला ने पूरे कच्छ का और भूकंप प्रभावित इलाकों का दौरा किया। कई कहानियां मिली, विकास के कई चेहरे दिखे, कुछ तबाह गांवों को विदेश में बसे गुजरातियों ने बसाया, कुछ को सियासी नेताओं ने तो कुछ आज भी अपने पुराने खंडहरों के साथ उन दिनों को याद कर रहे हैं।
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अंजार के दुधई गांव के दो चेहरे हैं। एक पुराना दुधई जो भूकंप की तबाही के अवशेषों के साथ फिर से अपने दम पर खड़ा है तो दूसरा नया दुधई जिसे दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा ने राष्ट्रीय स्वाभिमान ट्रस्ट के ज़रिये बसाया और नाम रखा इंद्रप्रस्थ।
पुराना दुधई
पुराने दुधई में पूरी तरह लेवा पटेल रहते हैं और अपनी ज़मीनों और खेतों के साथ उन्होंने खुद को वहां से हटाया नहीं, वहीं रह गए। अब बड़ी-बड़ी कोठियां हैं, बूढ़े-बुजुर्ग रहते हैं, नई पीढ़ी बड़े शहरों और विदेशों में बस गए हैं।
नया दुधई
नए दुधई यानी इंद्रप्रस्थ में पटेलों को छोड़कर जितनी जातियां थीं– हरिजन, मुसलमान, अहीर, वाणिया (ठक्कर), ब्राह्मण आदि.. सब बस गए। यहां 800 मकान बनाए गए और टेंट में डेढ़ साल से रह रहे इन लोगों को बसाया गया, जिनके घर पूरी तरह तबाह हो गए थे।
हालांकि आज इनमें से कई घर पावर ऑफ अटॉर्नी पर पैसेवालों ने खरीद लिए, शानदार घर बनवा लिए और किराये पर दे दिया.. जो कुछ पहले के लोग बचे हैं, उनकी हालत खराब है, घर जर्जर हालत में है, मालिकाना हक आज भी ट्रस्ट के ही पास है और मकान होकर भी ये खुद को बेघर मानते हैं।
नवावास
ऐसा ही गांव भुज में भी है। जूनावास और नवावास। जूनावास पुराना गांव है और नवावास नया। नवावास को विदेशों में रहने वाले लेवा पटेलों ने ऐसा बसा दिया कि ये मॉडल गांव बन गया। 19 बैंकों की शाखाएं खुल गईं, करीब 25 एटीएम हैं, अच्छा स्कूल, अस्पताल, मंदिर, बाजार तो हैं ही, सड़कें साफ सुथरी और आलीशान मकान भी आपको दिख जाएंगे।
जूनावास
वहीं पुराना गांव यानी जूनावास आज भी कोई खास प्रगति नहीं कर पाया। सरकारी रहमोकरम पर न तो यहां विकास हो पाया और न लोगों में वो एकता बन पाई। इसलिए वोट भी कभी भाजपा को तो कभी कांग्रेस को जाते रहे।
प्रकृति का अद्भुत नजारा
अब आपको ले चलते हैं कच्छ के रण में... यहां हो रहे रण उत्सव में। पीएम मोदी बार-बार जिस रण उत्सव की बात करते हैं, उसकी एक झलक आप भी देखिए...कच्छ का रण वैसे तो करीब 23 हज़ार वर्ग किलोमीटर में फैला है। उत्तर में करीब 250 किलोमीटर तो पूर्व में 5000 किलोमीटर से भी कहीं ज्यादा। बीच का जो हिस्सा है वो कुछ ज्यादा उभरा हुआ है जो साल के 6-7 महीने दलदल, पानी औऱ कीचड़ से भरा रहता है।
सूखने पर यही विशाल रण समुद्री नमक का विशाल रेगिस्तान बन जाता है। सूरज की रोशनी और पूरे चांद की रात में एक बेहतरीन सफेद मरुस्थल में तब्दील हो जाने वाला ये क्षेत्र खूबसूरत तो लगता ही है, प्रकृति का यह अद्भुत नज़ारा आपको हैरत में डाल देता है।
कला, संस्कृति, हस्तशिल्प का बेहतरीन मेल
भूकंप का केंद्र अक्सर इसी मरुस्थल में कहीं होता है और यह यहां के लिए आम बात है। लेकिन बड़े-बड़े भूकंप की त्रासदी झेलने और उससे उबरने में कच्छ का ये इलाका हमेशा चर्चा में रहता है। इसके एक तरफ रेगिस्तान है और दूसरी तरफ पाकिस्तान। घुसपैठियों के लिए एक मुफ़ीद रास्ता।
लेकिन नवंबर से फरवरी तक यहां का आलम कुछ और होता है। कला, संस्कृति, हस्तशिल्प का बेहतरीन मेल यहां होता है। पर्यटकों के लिए जो शानदार रण उत्सव यहां का पर्यटन मंत्रालय आयोजित करता है, उसकी भव्यता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।
कांग्रेस के राज में यह रण उत्सव तीन दिनों का होता था, बाद में मोदी सरकार ने इसे एक महीने का कर दिया और अब तो ये तकरीबन 4 महीनों तक चलता है... नवंबर से लेकर फरवरी तक। लेकिन सबसे ज्यादा भीड़ होती है दिसंबर और जनवरी में।
टेंट में बसा एक शानदार शहर
यहां आपको टेंट में बसा एक शानदार शहर नज़र आएगा... किसी भी पंच सितारा या उससे भी भव्य होटलों की हर सुख सुविधा और ऐशो आराम से भरपूर। तरह-तरह के हस्तशिल्प कलाकारों के स्टॉल्स, कच्छ की लोककलाओं की झलक, रात को रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम, बॉनफायर और सैलानियों के लिए टेंटों में बने बेहतरीन कमरे और सूट, शानदार डाइनिंग हॉल, विशाल स्वागत कक्ष और कैमल कार्ट से लेकर खूबसूरत ई रिक्शे से घूमने की सुविधा... कई किलोमीटर में खूबसूरत टेंट सिटी बसा देने में माहिर लल्लू जी एंड संस को ये ठेका मिलता है।
लल्लू जी एंड संस वही हैं, जो इलाहाबाद से लेकर देश के तमाम हिस्सों में शानदार टेंट में कुंभ की विशाल नगरी बसा देते हैं।
कच्छ में दिखेंगे रंग ही रंग
दुनिया ने मोदी के मार्केटिंग का खेल लगातार देखा है। देश विदेश में हर कार्यक्रम को एक इवेंट में तब्दील कर देने वाले मोदी ने कच्छ के रण उत्सव को भी अपने इसी हुनर की बदौलत जो रंग दिया है, उससे अमिताभ बच्चन की तरह आप भी कह उठेंगे– कच्छ नहीं देखा, तो कुछ नहीं देखा...!