गुजरात हाईकोर्ट ने पिछले साल हुए पुल हादसे के मामले में मोरबी नगरपालिका की याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से बुधवार को इनकार कर दिया।
सरकार ने नगरपालिका को नोटिस जारी किया था और 16 फरवरी तक जवाब देने को कहा था। सरकार ने यह भी कहा था कि नगरपालिका को प्रशासनिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहने पर क्यों भंग न किया जाए, जिसकी वजह से पिछले साल 30 अख्तूबर को पुल हादसा हुआ।
जस्टिस निरजर देसाई की कोर्ट ने गुजरात नगरपालिका अधिनियम की धारा 263 के तहत प्रस्तावित कार्रवाई पर राज्य सरकार द्वारा नगरपालिका को अपना जवाब दाखिल करने के लिए निर्धारित समय सीमा को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
नगरपालिका का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने कहा कि सरकार ने 13 फरवरी को एक नोटिस जारी किया और यह नगर निकाय के अध्यक्ष को 14 फरवरी को मिला और जवाब दाखिल करने के लिए केवल एक दिन का समय दिया गया। उन्होंने कहा कि इसी एजेंडे के साथ बुधवार को आम सभा की बैठक बुलाई गई है।
उन्होंने आगे कहा कि अगर बुधवार को कोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया तो पूरे मामले में कुछ नहीं बचेगा। कोर्ट ने कहा कि सरकार तय समय पर जो भी कार्रवाई करती है, नगरपालिका उसे चुनौती दे सकती है।
सरकार ने कहा है कि अगर नगरपालिका 16 फरवरी तक कारण बताओ नोटिस का जवाब देने में विफल रहती है, तो यह माना जाएगा कि उसके पास कहने के लिए कुछ नहीं है। सरकार इसे भंग करने के लिए एकतरफा फैसले के साथ आगे बढ़ेगी।
इस बीच, मोरबी नगरपालिका ने बुधवार को एक प्रस्ताव पारित कर कहा कि नगर निकाय ने शहर में पुल को ओरेवा समूह को सौंपने की मंजूरी कभी नहीं दी थी।
इस मुद्दे पर चर्चा के लिए दिन में हुई बोर्ड की आम बैठक में भाजपा शासित नगरपालिका के 52 पार्षदों में से 41 ने एक अलग जवाब प्रस्तुत किया, जिसमें कहा गया कि अधिकांश पार्षदों को उस समझौते के बारे में पता नहीं था, जिसके तहत पुल को रखरखाव और संचालन के लिए नगरपालिका द्वारा ओरेवा समूह को सौंप दिया गया था।
उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने 13 दिसंबर को गुजरात हाईकोर्ट को बताया था कि उसने नगरपालिका को भंग करने का फैसला किया है। अदालत ने नगर निकाय के सदस्यों को इस मामले में पक्षकार बनाए जाने की याचिका भी खारिज कर दी थी। सरकार ने त्रासदी का संज्ञान लिया था और एक जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल की थी।