पिछले 15 दिनों में मैं देख रहा हूं कि उनके खिलाफ वॉरंट जारी होने के कई मामले सामने आए हैं। 1998 के एक मामले में कोर्ट ने 2017 में संज्ञान लेकर उनके खिलाफ गैर-जमानती वॉरंट जारी किया था जिसमें वह पेश हुए। इसके बाद गंगापुर का वॉरंट आया और हरियाणा से भी उनके खिलाफ एक वॉरंट आ सकता है। तो पुराने मामले उनके खिलाफ खुल रहे हैं।
यह संयोग भी हो सकता है, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि तोगड़िया की बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के साथ अनबन हो चुकी है। वीएचपी के कार्यकारी प्रमुख के चुनाव में जब वह लड़े तो कहा जाता है कि संघ और बीजेपी का एक गुट मानता था कि उन्हें चुनाव नहीं लड़ना चाहिए।
लेकिन भुवनेश्वर की मीटिंग में उन्होंने शक्ति प्रदर्शन करते हुए दिखाया कि वीएचपी के 70 फीसदी लोग उनके साथ हैं। आरएसएस ने इसके बाद उन्हें तीन साल के लिए कार्यकारी प्रमुख बना दिया।
कहा जाता है कि तोगड़िया के बीजेपी नेताओं से काफी वैचारिक मतभेद हैं। तोगड़िया राम मंदिर से लेकर धारा 370 और समान आचार संहिता तक पर काफी मुखर होकर बोलते हैं। पिछले हफ्ते एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके उन्होंने कहा था कि राम मंदिर निर्माण के लिए मोदी सरकार को एक बिल संसद में लेकर आना चाहिए। छह मुद्दों पर उन्होंने मोदी सरकार को चुनौती देने की कोशिश की थी।
राम मंदिर के अलावा इन मुद्दों में रोजगार, किसान संबंधी मुद्दे भी थे। उनका कहना है कि तीन तलाक पर ही केवल मोदी सरकार को मुखर नहीं होना चाहिए। इसके अलावा वह सार्वजनिक रूप से काफी मुखर रहे हैं।
कितने मजबूत तोगड़िया?
तोगड़िया अब इतने मजबूत नहीं हैं कि उनसे डरा जाए। लेकिन वह भी शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे बीजेपी नेताओं की फेहरिस्त में हैं जो सरकार को चुनौती देते रहते हैं। साथ ही वह सरकारी नीतियों के खिलाफ खुलकर बोलते हैं। बीजेपी में उनका बहुत बड़ा प्रभाव हो ऐसा दिखता नहीं है।