प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी डिजिटल इंडिया को लेकर चाहे जो दावे करें, लेकिन रेल मंत्रालय को इसे अमल में लाने में पसीना आ रहा है। मंत्रालय अभी तक यही नहीं समझ पा रहा है कि उसे पूरे देश में यात्रियों को टिकट देने की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए कितनी कार्ड स्वैपिंग मशीन चाहिए। यहां तक कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी समुचित तरीके से डिजिटल लेन देन की असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के ठीक पास में रेलवे का वाणिज्यिक डिविजनल कार्यालय है। वहां भी एक लाइन में बने टिकट काउंटरों पर डिजिटल पेमेंट एक नए इम्तहान के देने जैसा है। यही स्थिति रेल भवन के टिकट काउंटर पर है। रेल भवन के पास में प्रेस क्लब पर दो टिकट काउंटर है।दो टिकट काउंटर पर एक कार्ड स्वैपिंग मशीन है। इस मशीन से ट्रेन का टिकट लेने और उसके भुगतान की प्रक्रिया को पूरा करने में करीब 4-5 मिनट लग रहे हैं। इसी तरह की स्थिति संसद भवन के भीतर रेल काउंटर पर भी है।
रेलवे बोर्ड को जानकारी नहीं
रेलवे बोर्ड के चेयरमैन से लेकर मेंबर ट्रैफिक (कामर्शियल) के सचिवालय तक अभी कोई अधिकारी यह बताने की स्थिति में नहीं है कि वास्तव में कितनी कार्ड स्वैपिंग मशीन की जरूरत है। कार्ड स्वैपिंग मशीनों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर मंत्रालय अभी आकलन और गणना केस्तर पर है। इसके लिए बजट प्रावधान समेत अन्य पर विचार विमर्श किया जा रहा है।
हां, मंत्रालय यह जरूर कह रहा है कि डिजिटल तरीके से टिकट लेने वालों की संख्या में आठ नवंबर 2016 के बाद से कई गुणा का इजाफा हुआ है। लोग जमकर इंटरनेट, ई-वॉलेट या ऑनलाइन टिकट ले रहे हैं, लेकिन रेलवे की ई-कैटरिंग में सामान्य बदलाव है। ई-कैटरिंग के लिए रेलवे को रोजाना 60-70 हजार के करीब ही ऑर्डर मिल रहे हैं।
रेलवे का अधिकारिक बयान
रेलवे बोर्ड के ट्रैफिक कामर्शियल के (ईडी-पीएम) बी. प्राशनाथ के अनुसार देश भर में 13000 आरक्षण के काउंटर हैं। 18 हजार विंडो सामान्य टिकट की है। इनमें आरक्षित काउंटरों पर यदि पॉज (पीओएस-कार्ड स्वैपिंग) मशीनें लगाते हैं, तो 13000 हजार मशीनों की ही जरूरत पड़ेगी। यदि सामान्य टिकट काउंटरों पर भी मशीन लगानी होगी हो, तो अधिक की जरूरत पड़ेगी।
हालांकि प्राशनाथ का कहना है कि अभी मांग के अनुरुप कार्ड स्वैपिंग मशीन मिल नहीं पा रही है। प्राशनाथ का मानना है कि ए1, ए और बी क्लास के स्टेशन काउंटरों पर कार्ड स्वैपिंग मशीन लगा दी गई हैं, लेकिन बैंक के सर्वर काफी धीमा चल रहे हैं। इसके चलते कार्ड स्वैपिंग मशीन से पैसा लेकर टिकट बनाने में समय लग रहा है। वैसे मौजूदा समय में प्लास्टिक कार्ड से रेलवे को पेमेंट करके टिकट लेने वालों का प्रतिशत 4.5 ही है।
प्राशनाथ का कहना है कि देश भर में 13-14 लाख रेट टिकट रोजाना बन रहे हैं। इसमें से58 प्रतिशत लोग ऑनलाइन टिकट लेते हैं और 42 प्रतिशत रेलवे के काउंटर पर आते हैं।
आखिरी सवाल बी प्राशनाथ से जब उन स्टेशनों के बारे में पूछा गया जहां न बिजली है और न इंटरनेट या वाई-फाई तो उन्होंने कहा कि इसके बारे में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से बातचीत चल रही है। हालांकि रेलवे ने लक्ष्य रखा है कि वह 31 जनवरी तक कार्ड स्वैपिंग मशीनों को लगाने का काम पूरा कर लेगा।