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ग्राउंड जीरो से: डिजिटल ट्रैक पर छुक-छुक कर रही है प्रभु की रेल

Sat, 31 Dec 2016 05:50 PM IST
शशिधर पाठक
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रेलमंत्री सुरेश प्रभु
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी डिजिटल इंडिया को लेकर चाहे जो दावे करें, लेकिन रेल मंत्रालय को इसे अमल में लाने में पसीना आ रहा है। मंत्रालय अभी तक यही नहीं समझ पा रहा है कि उसे पूरे देश में यात्रियों को टिकट देने की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए कितनी कार्ड स्वैपिंग मशीन चाहिए। यहां तक कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी समुचित तरीके से डिजिटल लेन देन की असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
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नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के ठीक पास में रेलवे का वाणिज्यिक डिविजनल कार्यालय है। वहां भी एक लाइन में बने टिकट काउंटरों पर डिजिटल पेमेंट एक नए इम्तहान के देने जैसा है। यही स्थिति रेल भवन के टिकट काउंटर पर है। रेल भवन के पास में प्रेस क्लब पर दो टिकट काउंटर है।दो टिकट काउंटर पर एक कार्ड स्वैपिंग मशीन है। इस मशीन से ट्रेन का टिकट लेने और उसके भुगतान की प्रक्रिया को पूरा करने में करीब 4-5 मिनट लग रहे हैं। इसी तरह की स्थिति संसद भवन के भीतर रेल काउंटर पर भी है।

रेलवे बोर्ड को जानकारी नहीं
रेलवे बोर्ड के चेयरमैन से लेकर मेंबर ट्रैफिक (कामर्शियल) के सचिवालय तक अभी कोई अधिकारी यह बताने की स्थिति में नहीं है कि वास्तव में कितनी कार्ड स्वैपिंग मशीन की जरूरत है। कार्ड स्वैपिंग मशीनों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर मंत्रालय अभी आकलन और गणना केस्तर पर है। इसके लिए बजट प्रावधान समेत अन्य पर विचार विमर्श किया जा रहा है। 
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हां, मंत्रालय यह जरूर कह रहा है कि डिजिटल तरीके से टिकट लेने वालों की संख्या में आठ नवंबर 2016 के बाद से कई गुणा का इजाफा हुआ है। लोग जमकर इंटरनेट, ई-वॉलेट या ऑनलाइन टिकट ले रहे हैं, लेकिन रेलवे की ई-कैटरिंग में सामान्य बदलाव है। ई-कैटरिंग के लिए रेलवे को रोजाना 60-70 हजार के करीब ही ऑर्डर मिल रहे हैं।

रेलवे का अधिकारिक बयान
रेलवे बोर्ड के ट्रैफिक कामर्शियल के (ईडी-पीएम) बी. प्राशनाथ के अनुसार देश भर में 13000 आरक्षण के काउंटर हैं। 18 हजार विंडो सामान्य टिकट की है। इनमें आरक्षित काउंटरों पर यदि पॉज (पीओएस-कार्ड स्वैपिंग) मशीनें लगाते हैं, तो 13000 हजार मशीनों की ही जरूरत पड़ेगी। यदि सामान्य टिकट काउंटरों पर भी मशीन लगानी होगी हो, तो अधिक की जरूरत पड़ेगी। 

हालांकि प्राशनाथ का कहना है कि अभी मांग के अनुरुप कार्ड स्वैपिंग मशीन मिल नहीं पा रही है। प्राशनाथ का मानना है कि ए1, ए और बी क्लास के स्टेशन काउंटरों पर कार्ड स्वैपिंग मशीन लगा दी गई हैं, लेकिन बैंक के सर्वर काफी धीमा चल रहे हैं। इसके चलते कार्ड स्वैपिंग मशीन से पैसा लेकर टिकट बनाने में समय लग रहा है। वैसे मौजूदा समय में प्लास्टिक कार्ड से रेलवे को पेमेंट करके टिकट लेने वालों का प्रतिशत 4.5 ही है।  

प्राशनाथ का कहना है कि देश भर में 13-14 लाख रेट टिकट रोजाना बन रहे हैं। इसमें से58 प्रतिशत लोग ऑनलाइन टिकट लेते हैं और 42 प्रतिशत रेलवे के काउंटर पर आते हैं।

आखिरी सवाल बी प्राशनाथ से जब उन स्टेशनों के बारे में पूछा गया जहां न बिजली है और न इंटरनेट या वाई-फाई तो उन्होंने कहा कि इसके बारे में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से बातचीत चल रही है। हालांकि रेलवे ने लक्ष्य रखा है कि वह 31 जनवरी तक कार्ड स्वैपिंग मशीनों को लगाने का काम पूरा कर लेगा।
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मंत्रालय को आयेगा पसीना

फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
रेलवे बोर्ड के सूत्र के मुताबिक देश में दूर-दराज के ऐसे हजारों स्टेशन और उनके टिकट काउंटर हैं, जहां बिजली और इंटरनेट नहीं है। यह स्टेशन सोलर ऊर्जा या बैट्री चालित ऊर्जा से चल रहे हैं। इसलिए इन्हें डिजिटलाइज किया जाना भी बड़ी चुनौती है।

सूत्र का कहना है कि अभी रेलवे जरूरत के हिसाब से महानगरों, बड़े शहरों के टिकट काउंटर पर कार्ड स्वैपिंग मशीन की सुविधा उपलब्ध कराने में जुटा है, लेकिन इसके लिए कर्मचारियों की ट्रेनिंग, त्रुटिरहित लेन-देन से लेकर अन्य तैयारियां की जानी है।

स्टाफ की कमी
रेलवे बोर्ड के सूत्रों के मुताबिक यदि चार काउंटर में से एक काउंटर को कार्ड स्वैपिंग मशीन से जोडऩे की पहल हो तब भी रेलवे को हजारों कर्मचारियों तथा नये टिकट काउंटर की जरूरत बढ़ेगी। सूत्र का कहना है कि रेलवे को 11.8 लाख अतिरिक्त यात्री मिलने की संभावना है। हर साल ट्रेन की संख्या बढ़ रही है। इसे देखते हुए हर टिकट काउंटरों की संख्या बढ़ रही है, जबकि कार्ड स्वैपिंग मशीन से टिकट देने की प्रक्रिया पूरी करने में चार-पांच मिनट तक लग रहे हैं। नेटवर्क भी धीमा चलने की शिकायतें आ रही हैं। इसके चलते काउंटर पर पीक सीजन में लंबी लाइनें लगने की स्थिति बनेगी। इसलिए नए काउंटर और कर्मचारियों की जरूरत पड़ेगी।

2017 तक मुमकिन नहीं
निदेशक स्तर के सूत्र का कहना है कि 2017 तक भारतीय रेल को कार्ड स्वैपिंग मशीन या ऑनलाइन पेमेंट की स्थिति से नहीं जोड़ा जा सकता। वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार रेलवे की टिकट खरीद फरोख्त प्रक्रिया को डिजिटलाइज करने के लिए सबसे पहले सभी रेलवे स्टेशन पर बिजली, इंटरनेट या वाई-फाई सुविधा से जोड़ना होगा।

ऐसा माना जा रहा है रेलवे इसके लिए यात्रियों की सामर्थ्य पर उम्मीद टिकाए है। उसे उम्मीद है कि समाज का संपन्न तबका अपने संसाधन से ऑनलाइन टिकट खरीदेगा। देश में नकदी के प्रवाह के बाद स्थिति सामान्य हो जाएगी और कार्ड स्वैपिंग मशीन की जरूरत अपने आप घट जाएगी।
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