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बुलंदशहर ग्राउंड रिपोर्ट: बेटों का इलाज कराया...बेटियां कमजोर, फिर भी नहीं किया भर्ती

गौरव शर्मा, बुलंदशहर Published by: देव कश्यप Updated Thu, 07 Jan 2021 03:04 AM IST
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बुलंदशहर पोषण पुनर्वास केंद्र के बाहर जमीन पर बैठा अपने कुपोषित बच्चे के साथ हेमंत - फोटो : अमर उजाला

पुष्टाहार योजना ने शिकारपुर, अनूपशहर, बुलंदशहर के कई गांवों की चौखट पर तोड़ा दम। बुलंदशहर पोषण पुनर्वास केंद्र के स्टाफ ने बताया कि यहां बेटा और बेटी में फर्क अब भी लोग करते हैं। नगर के धमेड़ा, टांडा, गिरधारीनगर, शांतिनगर, सरायधारी, मामनचौक आदि क्षेत्रों से अति कुपोषित बच्चे उपचार के लिए आए। टांडा, धमेड़ा में ऐसे मामले रहे कि यदि लड़का रहा तो परिजनों ने उसे भर्ती किया और खानपान का खूब ध्यान रखा। बेटी है और उसे भर्ती कराने को कहा तो बहाना बनाकर ले गए।

10 महीने में 1.5 किलो गेहूं, दूध व घी का पता नहीं
शिकारपुर देहात के मजरा आंबेडकरनगर में दोपहर करीब एक बजे अमरवती के घर पहुंचे। टूटा हुआ मुख्य द्वार गरीबी के कारण बनवा नहीं पाईं, अंदर से मकान कच्चा है, गुनगुनी धूप में बच्चे खेलकूद में व्यस्त थे। चार वर्षीय अति कुपोषित बच्ची संजना भी नहा धोकर अन्य चार भाइयों के साथ खेल रही थी। मां का दायित्व निभाते हुए अमरवती सभी बच्चों को संभालने, खाना पकाने और घर के कामकाज निपटाने में लगी हुई थी।




घर के सामान को सहेजकर बच्चों के सामने उस गरीबी की चादर को भी ढकने की कोशिश कर रही थी। लेकिन उसके चेहरे पर दर्द और कसक सिस्टम के खिलाफ थी। अमरवती ने बताया कि गर्भवती होने के दौरान या बच्चे के होने पर उसे कभी सरकारी मदद नहीं मिली। सरकारी अस्पताल में प्रसव कराया, वहीं जननी सुरक्षा योजना का लाभ नहीं मिला। पति दुर्गा प्रसाद मजदूरी कर दिन के 200 से 300 रुपया रोज कमा लाते हैं। काम न मिले तो एक रुपये की आमदनी भी दिन की नहीं हो पाती। पांच बच्चों में बड़ी बेटी राधा (10), खुशी (8), शिवांश (6), संजना (4) और वैष्णवी ( 6 महीने) है।

राधा, खुशी और शिवांश का दाखिला स्कूल में करा दिया था। घर की बेकार आर्थिक हालत के कारण कोरोना से पहले ही तीनों बच्चों को स्कूल से निकालकर घर पर बैठा लिया। भविष्य में भी बच्चों को पढ़ाये जाने की उम्मीद नहीं है। अमरवती का आरोप है कि करीब दो महीने पहले डेढ़ किलो गेहूं मिला। नियमतः लाभार्थियों को घर गेहूं देने का प्रावधान है, लेकिन अमरवती को डेढ़ किलो गेहूं पाने के लिए भी दर दर की ठोकरे खानी पड़ी। इसके अलावा दाल, चावल, घी और दूध मिलना अमरवती के लिए फिलहाल सपना ही है। अमरवती की सबसे छोटी बेटी वैष्णवी भी अति कुपोषित जैसी लगती है। लेकिन उसे यह बात सालती है कि छह महीने गुजरने के बावजूद उसकी बेटी का वजन तोलने कोई कर्मचारी नहीं आया है।

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बुलंदशहर पोषण पुनर्वास केंद्र के बाहर जमीन पर बैठा अपने कुपोषित बच्चे के साथ हेमंत - फोटो : अमर उजाला
पुष्टाहार योजना ने शिकारपुर, अनूपशहर, बुलंदशहर के कई गांवों की चौखट पर तोड़ा दम। बुलंदशहर पोषण पुनर्वास केंद्र के स्टाफ ने बताया कि यहां बेटा और बेटी में फर्क अब भी लोग करते हैं। नगर के धमेड़ा, टांडा, गिरधारीनगर, शांतिनगर, सरायधारी, मामनचौक आदि क्षेत्रों से अति कुपोषित बच्चे उपचार के लिए आए। टांडा, धमेड़ा में ऐसे मामले रहे कि यदि लड़का रहा तो परिजनों ने उसे भर्ती किया और खानपान का खूब ध्यान रखा। बेटी है और उसे भर्ती कराने को कहा तो बहाना बनाकर ले गए।

10 महीने में 1.5 किलो गेहूं, दूध व घी का पता नहीं
शिकारपुर देहात के मजरा आंबेडकरनगर में दोपहर करीब एक बजे अमरवती के घर पहुंचे। टूटा हुआ मुख्य द्वार गरीबी के कारण बनवा नहीं पाईं, अंदर से मकान कच्चा है, गुनगुनी धूप में बच्चे खेलकूद में व्यस्त थे। चार वर्षीय अति कुपोषित बच्ची संजना भी नहा धोकर अन्य चार भाइयों के साथ खेल रही थी। मां का दायित्व निभाते हुए अमरवती सभी बच्चों को संभालने, खाना पकाने और घर के कामकाज निपटाने में लगी हुई थी।


घर के सामान को सहेजकर बच्चों के सामने उस गरीबी की चादर को भी ढकने की कोशिश कर रही थी। लेकिन उसके चेहरे पर दर्द और कसक सिस्टम के खिलाफ थी। अमरवती ने बताया कि गर्भवती होने के दौरान या बच्चे के होने पर उसे कभी सरकारी मदद नहीं मिली। सरकारी अस्पताल में प्रसव कराया, वहीं जननी सुरक्षा योजना का लाभ नहीं मिला। पति दुर्गा प्रसाद मजदूरी कर दिन के 200 से 300 रुपया रोज कमा लाते हैं। काम न मिले तो एक रुपये की आमदनी भी दिन की नहीं हो पाती। पांच बच्चों में बड़ी बेटी राधा (10), खुशी (8), शिवांश (6), संजना (4) और वैष्णवी ( 6 महीने) है।

राधा, खुशी और शिवांश का दाखिला स्कूल में करा दिया था। घर की बेकार आर्थिक हालत के कारण कोरोना से पहले ही तीनों बच्चों को स्कूल से निकालकर घर पर बैठा लिया। भविष्य में भी बच्चों को पढ़ाये जाने की उम्मीद नहीं है। अमरवती का आरोप है कि करीब दो महीने पहले डेढ़ किलो गेहूं मिला। नियमतः लाभार्थियों को घर गेहूं देने का प्रावधान है, लेकिन अमरवती को डेढ़ किलो गेहूं पाने के लिए भी दर दर की ठोकरे खानी पड़ी। इसके अलावा दाल, चावल, घी और दूध मिलना अमरवती के लिए फिलहाल सपना ही है। अमरवती की सबसे छोटी बेटी वैष्णवी भी अति कुपोषित जैसी लगती है। लेकिन उसे यह बात सालती है कि छह महीने गुजरने के बावजूद उसकी बेटी का वजन तोलने कोई कर्मचारी नहीं आया है।

बारिश में टपकती छत, सरकारी मदद महज छलावा

गांव आंबेडकरनगर में अपने अतिकुपोषित बच्ची संजना के साथ मां अमरवती - फोटो : अमर उजाला
दलित बहुल इस गांव में एक किनारे पर हिना पत्नी तहसीन का परिवार भी झोपड़ी नुमा कच्चे घर में रहता है। हिना के तीन बेटी झलक(6), मुस्कान(4), आफिया (3) हैं। तीन साल की आफिया का वजन करीब सात किलोग्राम है। आफिया अति कुपोषित है। हिना बताती हैं कि लॉकडाउन के बाद 10 महीने में उन्हें पांच किलोग्राम गेहूं दिया गया है।लॉकडाउन से पहले एक दो बार दलिया और आटे की थैली मिली थी। कुपोषण से बचाव के लिए इसके अलावा उन्हें कुछ नहीं मिला।

अफसर व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता छुपा रहीं जमीनी हालात
कुपोषण को लेकर सरकार जो सकारात्मक तस्वीर पेश कर रही है। जमीन पर हालात उतने ही खराब हैं। पोषाहार कार्यक्रम से जुड़े एक कर्मी ने बताया कि आंबेडकरनगर में यदि सर्वे सही से किया जाए तो 40 से अधिक बच्चे कुपोषित व अति कुपोषित निकल सकते हैं। जबकि यहां कागजों में 11 बच्चे दर्शा रखे हैं। उन्हें भी पोषाहार पूरा नहीं मिल पाता।

इसके अलावा शिकारपुर तहसील के ही गांव रिवाड़ा और धामनी में कुपोषण के बुरे हाल हैं। ग्रामीणों ने बताया कि गेहूं, दाल, चावल, घी और दूध जितने देने के दावे किए जा रहे हैं, वह सब हवा में हैं। लॉकडाउन के बाद से करीब आठ महीने तक तो कुछ नहीं मिला। अब केवल गेहूं या किसी को चावल थमा दिया जाता है। बुलंदशहर के गांव दरियापुर में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रिपोर्ट कार्ड ही छिपाती रहीं।

अनूपशहर, बुलंदशहर के शहरी क्षेत्र के भी हाल बुरे
अनूपशहर में गांव सिरौरा में पांच, कतियावली में चार,मौहरसा में दो, दरावर पांच, बझेड़ा सात, सिरौरा तीन, पौटा बादशाहपुर दो, नगला नलू दो, तोरई, पहाड़पुर आदि में भी कुपोषित बच्चे हैं। बुलंदशहर शहरी क्षेत्र में टांडा, मामनचौक, गिरधारी नगर आदि क्षेत्रों में भी बुरे हाल हैं। विभाग के सूत्रों ने बताया कि बच्चे कुपोषण की जद से भी बाहर आये हैं, लेकिन पोषण वितरण के जमीनी हालात अभी भी बेहद जर्जर हैं। उपरोक्त गांवों में भी स्थिति दयनीय बताई गई।

आंकड़े एक नजर में

आंबेडकरनगर गांव की अमरवती अपने अतिकुपोषित बच्ची संजना व अन्य बच्चों के लिए खाना पकाते हुए - फोटो : अमर उजाला
छह साल तक के कुल बच्चों की संख्या- 3,35,047
कुपोषित- 13,368
अतिकुपोषित- 4,485
11 से 14 वर्ष तक की कुपोषित बेटियां जो स्कूल नहीं जातीं- 4820

प्रत्येक लाभार्थी को मिलेगा राशन
बुलंदशहर जिला कार्यक्रम अधिकारी हरिओम वाजपेयी ने बताया कि कुपोषित के साथ सामान्य बच्चे, गर्भवती, धात्री सभी को पोषाहार दिए जाने के शासन के निर्देश हैं।


एनआरसी में अंदर बेड, बाहर जमीन पर मरीज
बुलंदशहर जिला अस्पताल परिसर में राष्ट्रीय पुनर्वास पोषण केंद्र (एनआरसी) जनवरी 2016 से स्थापित है। यहां केंद्र के बाहर पिता हेमंत कुमार और मां प्रियंका एनआरसी के ठीक सामने कुपोषित बच्चे कान्हा (4) व यतिन ( ढाई साल) को लेकर जमीन पर लेटे हुए थे। अचरज यह था कि अंदर केंद्र में सभी 10 बेड खाली पड़े हुए थे। जमीन पर लेटे जाने के जवाब में स्टाफ ने कहा कि ठंड में धूप लेने के कारण कुछ समय के लिए बाहर चले गए।

वहीं, पिता हेमंत कुमार ने बताया कि राधानगर कॉलोनी में किराए पर रहकर मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं। कभी कोई आंगनबाड़ी कार्यकर्ता जांच के लिए घर नहीं आई। सात दिसंबर को कान्हा के पेट में दर्द होने व तबीयत बिगड़ने पर चिकित्सकों ने एनआरसी में भर्ती होने को कहा। अगले दिन आठ दिसंबर को एनआरसी केंद्र में भर्ती करा दिया। बच्चा गंभीर स्थिति में था। बच्चे का वजन 12.100 किलोग्राम होना चाहिए था, जबकि उसका वजन 10.300 किलोग्राम मिला। उन्होंने बताया कि यहां बच्चे को खिचड़ी, चावल, हलवा और दूध का पैकेट मिलता है।

हेमंत बात करते हुए फफक पड़ता है। मां प्रियंका ने बताया कि उन्हें केवल खाना ही दिया जाता है। जबकि मेन्यू में खानपान काफी अलग है। स्टाफ ने बताया कि प्रदेश सरकार ने एनआरसी केंद्र में प्रति वर्ष 240 अति कुपोषित बच्चों के उपचार का लक्ष्य रखा है।

स्वास्थ्य विभाग के हिसाब से फिट, डीपीओ के अनुसार अनफिट

आंबेडकरनगर गांव में हिना अपने बच्चों के साथ - फोटो : अमर उजाला
बुलंदशहर नगर के दरियापुर गांव में जाकर पड़ताल की तो पता चला कि यहां 10 से अधिक बच्चे डीपीओ कार्यालय के अनुसार तो कुपोषित हैं। जबकि स्वास्थ्य विभाग उन्हें फिट मानता है। इसके पीछे का कारण बताया कि एनआरसी समेत स्वास्थ्य विभाग बच्चे की लंबाई के सापेक्ष कम वजन को कुपोषण का कारक मानता है, जबकि डीपीओ कार्यालय की गणना उम्र के सापेक्ष वजन से है। उदाहरण के तौर पर कोई बच्चा उम्र में अधिक है, उसकी लंबाई बेहद कम और वजन  कम है तो स्वास्थ्य विभाग ऐसे बच्चे को कुपोषित नहीं मानेगा, जबकि संभावना यह है कि डीपीओ कार्यालय के मापन में वह कुपोषित हो।

बुलंदशहर के सीडीओ अभिषेक पांडेय ने बताया कि 'जिले में 838 स्वयं सहायता समूह की जिम्मेदारी है कि वो पोषाहार लाभार्थियों तक पहुंचाएं। यदि शिकारपुर, अनूपशहर व अन्य क्षेत्रों के गांवों में पोषाहार नहीं मिला है तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी। एनजीओ पदधिकारियों से भी जवाब तलब किया जाएगा।'
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