ग्रीनलैंड में बर्फ पिघलने की दर बहुत तेजी से बढ़ रही है, जो दुनियाभर की जलवायु के लिए खतरनाक है। क्योंकि यह समुद्र के स्तर में वृद्धि के लिए जिम्मेदार है और वायुमंडलीय प्रसार के पैटर्न को भी प्रभावित करता है। तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों, पारिस्थितिकी तंत्रों पर प्रभाव डालेंगे।
बार्सिलोना विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के ताजा अध्ययन के अनुसार बर्फ और बर्फ के बड़े इलाके तेजी से पिघल रहे हैं। इस तरह की घटनाएं 1950 से 1990 की अवधि की तुलना में हाल के दशकों में गर्मियों के दौरान लगभग दोगुनी बार हुई हैं। अध्ययन यूबी के भूगोल विभाग के अंटार्कटिका, आर्कटिक और अल्पाइन अनुसंधान समूह ने किया है। जर्नल ऑफ क्लाइमेट में प्रकाशित शोध से पता चलता है कि पिछले दशक में ग्रीनलैंड में बर्फ के अत्यधिक पिघलने के चरम साल देखे गए हैं। उदाहरण के लिए, 2012 की गर्मियों के दौरान 610 गीगाटन बर्फ पिघली। यह 24.4 करोड़ ओलंपिक स्विमिंग पूल के बराबर है। 2019 में 560 गीगाटन बर्फ पिघली। बर्फ पिघलने की घटना का सीधा संबंध ग्लोबल वार्मिंग से है।
शोधकर्ताओं के अनुसार 1950 से 1990 के बीच पहले कभी बर्फ पिघलती नहीं देखी गई थी। इससे इसमें संरचनात्मक बदलाव हुए हैं और बर्फ के बड़े हिस्सों के समुद्र में टूटकर गिरने का खतरा बढ़ गया है। महासागर और वायुमंडल को प्रभावित करने के अलावा बर्फ की चादरें इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनमें वार्षिक परतें होती हैं जो पृथ्वी के जलवायु इतिहास का एक अनूठा और मूल्यवान रिकॉर्ड रखती हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि सतह पर ग्लेशियरों के पिघलने से होने वाले नुकसान को अन्य गतिशील प्रक्रियाओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए। जैसे कि हिमखंडों का सीधे समुद्र में गिरना और ग्लेशियरों का समुद्र में प्रवाहित होना। इनमें से दोनों ही के पिघलने की दर तेज हो रही है। हाल ही में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि के कारण आर्कटिक वैश्विक औसत दर से चार गुना अधिक गर्म हो रहा है।
- बर्फ के तेजी से पिघलने का संबंध उत्तरी अक्षांशों से लगातार गर्म और नमी वाले एंटी-साइक्लोनिक हवा के कारण होने वाली अत्यधिक गर्मी है।