ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण के संरक्षण को लेकर देश में एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर इस योजना का पूरा श्रेय लेने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि इस पक्षी को बचाने की पहल पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन अब इसका पूरा क्रेडिट प्रधानमंत्री को दिया जा रहा है।
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब केंद्रीय मंत्री ने गुजरात में एक दशक बाद गोडावण के चूजे के जन्म की जानकारी दी और इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल का नतीजा बताया। इसके बाद जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि 2010 में उन्होंने खुद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी को पत्र लिखकर इस पक्षी के संरक्षण के लिए कदम उठाने को कहा था।
Just as a matter of historical interest, on June 9 2010, the-then Union Minister of Environment and Forests…
pic.twitter.com/XdZ4HcTgVn— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh)
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क्या 2010 में ही शुरू हो चुकी थी पहल?
जयराम रमेश ने बताया कि जब वह पर्यावरण मंत्री थे, तब 9 जून 2010 को उन्होंने गुजरात सरकार को पत्र लिखा था। इस पत्र में कच्छ के घास के मैदानों में गोडावण की घटती संख्या को लेकर चिंता जताई गई थी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो यह पक्षी गुजरात से पूरी तरह खत्म हो सकता है।
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क्या गोडावण को राष्ट्रीय पक्षी बनाने की भी मांग हुई थी?
रमेश ने यह भी याद दिलाया कि 1961 में प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक सलीम अली ने गोडावण को राष्ट्रीय पक्षी बनाने का सुझाव दिया था क्योंकि यह तेजी से विलुप्त हो रहा था। लेकिन 1963 में भारतीय वन्यजीव बोर्ड ने मोर को राष्ट्रीय पक्षी चुना, जिसके पीछे सांस्कृतिक और धार्मिक कारण बताए गए थे।
गुजरात में गोडावण की स्थिति कितनी गंभीर है?
पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, गुजरात के कच्छ इलाके में अब सिर्फ तीन मादा गोडावण ही बची हैं। नर पक्षियों के खत्म हो जाने के कारण प्राकृतिक तरीके से अंडा बनने की संभावना लगभग खत्म हो चुकी है। यही वजह है कि अब कृत्रिम संरक्षण और नए प्रयोग किए जा रहे हैं।
कैसे हुआ 770 किलोमीटर का खास ऑपरेशन?
इस बार राजस्थान से एक अंडे को 770 किलोमीटर दूर गुजरात लाया गया। यह यात्रा बिना रुके करीब 19 घंटे में पूरी की गई। अंडे को एक विशेष पोर्टेबल इनक्यूबेटर में रखा गया और कच्छ में मादा गोडावण के घोंसले में रखा गया। 26 मार्च को इस अंडे से चूजा निकला, जिसे अब उसकी ‘फोस्टर मदर’ पाल रही है।
क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?
सरकार का कहना है कि संरक्षण केंद्रों में अब गोडावण की संख्या बढ़कर 73 हो गई है। आने वाले समय में इन पक्षियों को फिर से प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा जाएगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि गोडावण को बचाना शेर और बाघ जितना ही जरूरी है, क्योंकि यह भारत की जैव विविधता का अहम हिस्सा है।
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