देशभर की जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों को रखे जाने के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से भीड़ में कमी लाने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने सरकार को अगले वर्ष 31 मार्च तक कार्य योजना तैयार करने को कहा है। न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल की पीठ ने कहा कि जब तक लोगों के मूल अधिकारों और मानवाधिकारों को महत्व नहीं दिया जाएगा तब तक संविधान के अनुच्छेद -21 के तहत नागरिकों को प्रदत्त जीने का अधिकार और सम्मान से जीने के अधिकार का कोई मतलब नहीं है।
पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत ने अपने आदेशों के जरिए कहा है कि सजायाफ्ता और विचाराधीन कैदियों के भी कुछ मूल अधिकार और मानवाधिकार हैं, लेकिन ऐसा देखा जा रहा है कि इस पर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ध्यान नहीं दे रहे हैं। यह दुखद है। पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए कि वह विपरीत परिस्थिति में है, उसे मूल अधिकारों और मानवाधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता। साथ ही शीर्ष अदालत ने महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय को हिरासत में रह रहे किशोरों के लिए मैन्यूवल तैयार करने में तेजी लाने के लिए कहा है।
अदालत ने पाया कि उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, असम, छत्तीसगढ़, झारखंड, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान की जेलों में क्षमता से 150 फीसदी अधिक बंदी हैं। पीठ ने कहा कि न तो किसी राज्य और न ही किसी केंद्र शासित प्रदेश ने इसके लिए कार्ययोजना तैयार करने की जहमत उठाई है। यही वजह है कि हमने राज्यों और जेल के आईजी को जेल में कैदियों की ‘भीड़’ को कम करने का निर्देश दिया था। अदालत ने पाया कि जेल में अतिरिक्त बैरक बनाने के प्रस्ताव थे लेकिन लगता है कि ये अस्थायी प्रस्ताव हैं, क्योंकि इसके लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की गई है। लिहाजा पीठ ने 31 मार्च 2017 तक कार्ययोजना तैयार करने को कहा है।