अमेरिका की एक एजेंसी ने अपने शोध में दावा किया है कि 2050 तक मुंबई बाढ़ से डूब सकता है। बाढ़ से सालाना प्रभावित होने वाले 50 लाख लोगों के मुकाबले साल 2050 में साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे। इसी के साथ यह भी दावा किया गया है कि अगर वैश्विक कॉर्बन उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं की गयी तो बाढ़ से मुंबई और नवी मुंबई के बड़े भाग प्रभावित होंगे।
इसी मुद्दे पर मंगलवार को राज्यसभा में सरकार ने कहा कि समुद्र के स्तर में संभावित वृद्धि के कारण मुंबई के जलमग्न होने का कोई खतरा नहीं है, सरकार ने सांसदों से भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए डेटा पर विश्वास रखने का आग्रह करते हुए कहा कि वैज्ञानिकों के इस डेटा को पूरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ दर्जा दिया गया है।
प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सदस्यों द्वारा प्रश्नों की एक श्रृंखला का जवाब देते हुए, पृथ्वी विज्ञान मंत्री हर्षवर्धन ने कहा कि मुंबई के जलमग्न होने का सवाल देश के बाहर कही गई कुछ बातों पर आधारित मीडिया रिपोर्टों के कारण उत्पन्न हुआ है।
उन्होंने कहा, हम जो कुछ भी कह रहे हैं वह हमारे वैज्ञानिकों की रिपोर्ट पर आधारित है और उनके द्वारा तैयार किए गए डेटा को पूरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। आपके लिए मुंबई की चिंता करने का कोई कारण नहीं है। मुंबई जलमग्न होने वाली नहीं है। उन्होंने आगे कहा उपलब्ध डेटा और मॉडल अध्ययन दक्षिणी मुंबई के एक प्रमुख हिस्से में 2040-50 के दौरान वर्ष में कम से कम एक बार आने वाली बाढ़ का संकेत नहीं देते हैं, जैसा कि एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट में प्रकाशित हुआ है।
मुंबई तट पर, 1878-2005 के दौरान एकत्र किए गए ज्वार गेज के आंकड़ों के आधार पर समुद्र के स्तर में औसत वृद्धि लगभग 0.74 मिमी प्रति वर्ष रही है। उसके अनुसार, मुंबई तट पर समुद्र का स्तर 2050 में वर्तमान स्तर से 33.3 मिमी या 3.33 सेमी बढ़ जाएगा। यह अनुमान इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओशन इन्फॉर्मेशन सर्विस (INCOIS) ने लगाया है, जो मुंबई स्थित अपोलो बंदर के समुद्र स्तर की नाप के आंकड़ों और समुद्र के स्तर में दीर्घकालिक रुझानों पर आधारित है।
एक अन्य प्रश्न पर कि क्या सरकार इस मुद्दे को उठा रही है, मंत्री ने कहा मुझे आपको बताना होगा, यह वही देश है जो 2004 में सुनामी प्रभावित हो गया था, उस वक्त हम इसके प्रति जागरूक नहीं थे। आज हम सुनामी से बचने के लिए जो डेटा चेतावनी के लिए तैयार करते हैं उसे दुनिया में नंबर एक के रूप में दर्जा दिया गया है।
भारत अपने तटीय इलाकों के साथ अन्य देशों के साथ भी चक्रवात पर डेटा साझा कर रहा है तो कोई कारण नहीं है कि हमें अपने वैज्ञानिकों की क्षमता पर संदेह करना चाहिए। हम आज दुनिया में इस मामले में आधिकारिक तौर पर नंबर एक पर हैं। तटीय शहरों पर समुद्र के स्तर में वृद्धि के प्रत्यक्ष प्रभाव पर काम नहीं किया गया है, यह बताते हुए कि मंत्री ने कहा कि समुद्र के स्तर में वृद्धि के कारण तट पर संभावित प्रभाव के आकलन के आधार पर आईएनसीओआईएस (INCOIS) द्वारा तैयार तटीय भेद्यता मानचित्र से पता चलता है कि मुंबई क्षेत्र बहुत उच्च असुरक्षित वर्ग के अंतर्गत नहीं आता है।
उन्होंने कहा कि समुद्र के स्तर में धीमी वृद्धि अकेले तटों को प्रभावित नहीं कर सकती है, लेकिन समुद्र के स्तर में वृद्धि तटीय खतरों जैसे तूफान, सुनामी, तटीय बाढ़, उच्च लहरों और निचले तटवर्ती तटीय क्षेत्रों में तटीय क्षरण को प्रभावित कर सकती है।