केन्द्र सरकार ने फिर बातचीत के जरिए कश्मीर की समस्या सुलझाने की पहल की है। इसके लिए खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को कैबिनेट सचिव स्तर का दर्जा देकर प्रमुख वार्ताकार नियुक्त किया गया है। इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लाल किले से की घोषणा के अगले कदम के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री ने लाल किला की प्राचीर से कहा था कि कश्मीर की समस्या का समाधान न गाली से होगा, न गोली से। इसका समाधान वहां के लोगों को गले लगाने से होगा।
इससे पहले केन्द्र सरकार ने 2010 में कश्मीर में हिंसा भड़कने के बाद समस्या के समाधान को लेकर तीन वार्ताकारों को नियुक्त किया था। इनमें वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर, पूर्व सूचना आयुक्त एमएम अंसारी और प्रो. राधाकुमार शामिल थी। तब पी. चिदंबरम केन्द्रीय गृहमंत्री थे।
इन वार्ताकारों ने 2011 में अपनी रिपोर्ट दी थी और इसे तत्कालीन केन्द्र सरकार ने काफी गंभीरता से लिया था। इसके बाद मई 2014 में एनडीए की सरकार सत्ता में आई। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर समस्या के समाधान को लेकर केन्द्र सरकार का शुरू का निर्णय सही नहीं रहा। कश्मीर, पाकिस्तान, अलगाववादियों को लेकर केन्द्र सरकार के भिन्न नजरिए से समस्या उलझती चली गई।
क्या सही है वार्ता की पहल
केन्द्र सरकार के रणनीतिकारों का मानना है कि कश्मीर में समस्या के समाधान के वार्ता की पहल का यह सही समय है। सेना मुख्यालय के सूत्र का कहना है कि नियंत्रण रेखा पर आए दिन घुसपैठ का प्रयास करते हुए आतंकी मारे जा रहा हैं। सेना मुख्यालय का कहना है कि आतंकियों के खिलाफ उसका लगातार रवैया काफी सख्त रहा है।
घाटी के भीतर सीमापार से घुसपैठ कर चुके आतंकियों के साथ भी सुरक्षा बलों की आए दिन मुठभेड़ जारी है। इस साल अभी तक करीब 160 आतंकियों के मारे जाने की सूचना है। खुद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा था कि हर रोज सुरक्षा बल 4-5 आतंकवादियों को मुठभेड़ में मार रहे हैं। इस तरह से आतंकियों के खिलाफ सरकार का रवैय्या काफी सख्त है।
घाटी और कश्मीर में चल रही आतंकी गतिविधियों के लिए वित्तीय मदद पहुंचाना टेढ़ी खीर हो गया है। हाल में एनआईए ने भी एक बड़े रैकेट का भंडाफोड़ किया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी इस मामले की तहकीकात कर रही है और केन्द्रीय गृह मंत्रालय तथा केन्द्र सरकार लगातार फंडिग पर शिकंजा कस रही है।