इंडिया गठबंधन ने समझदारी भरा फैसला लिया। 5 जून को हुई इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद राष्ट्रीय स्तर के एक नेता ने बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और एनसीपी प्रमुख शरद पवार सरकार बनाने का दावा पेश करने से जुड़ी सभी पेचीदगियां समझ रहे थे। पार्टी की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी को भी पता था कि सहयोगी दल सरकार बनाने का भले दावा करें, लेकिन कई तकनीकी रुकावटें हैं।
कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि भाजपा तो सतर्क थी। उसे लग रहा था कि विपक्षी गठबंधन सरकार बनाने की पहल कर सकता है। बताते चलें कि चुनाव नतीजा आने से पहले भाजपा और केंद्र के रणनीतिकार 9 जून को ही शपथ लेने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन सूत्र की मानें तो चुनाव नतीजा आने के बाद से भाजपा जल्दबाजी में आ गई। वह तेजी से कई निर्णय ले रही थी। भाजपा मुख्यालय के भी एक नेता ने 9 जून के बजाय 8 जून को ही तीसरे कार्यकाल के लिए शपथ की संभावना जता दी थी, लेकिन विपक्षी गठबंधन का निर्णय आने के बाद तारीख दोबारा बदलकर 9 जून कर दी गई।
क्या थी विपक्षी गठबंधन के रास्ते में सरकार बनाने में पेचीदगियां?
विपक्ष के सांसदों की संख्या भाजपा से भी कम है। इस तरह से 18वीं लोकसभा में सबसे अधिक सांसदों वाला दल भी भाजपा ही है। विपक्षी गठबंधन और एनडीए, दोनों द्वारा सरकार बनाने का दावा पेश करने की स्थिति में राष्ट्रपति सबसे पहले भाजपा को ही आमंत्रित करतीं। यह स्थिति आने पर विपक्षी गठबंधन को फजीहत का सामना करना पड़ता। मल्लिकार्जुन खरगे और शरद पवार का मानना था कि संयम, अनुशासन और मर्यादा की राजनीति ठीक है। सिर मुंडाते ही ओले पड़ने जैसी स्थिति आना सही नहीं होगा। विपक्षी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए 272 की जरूरी संख्या तक पहुंचने का भरोसा भी नहीं था। यह दूसरी बड़ी पेचीदगी थी। एमके स्टालिन को भी सहयोगी दलों के साथ आने को लेकर चिंता थी।
पटना से दिल्ली की उड़ान में तेजस्वी यादव और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साथ आए थे। नीतीश ने लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही विपक्ष का साथ छोड़ा था। इसलिए नीतीश कुमार और जद(यू) के इतना जल्द विपक्ष के साथ जुड़ने की कोई संभावना नहीं दिखाई दी। उधर, चंद्रबाबू नायडू(टीडीपी) के एनडीए का साथ छोड़ देने के कोई संकेत नहीं नजर आ रहे थे। पश्चिम बंगाल की नेता ममता बनर्जी भी जनादेश 2024 को देखकर संभलकर चल रही हैं। कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड के रणनीतिकार की मानें तो सरकार बनाने का दावा करना राजनीतिक उलझनें काफी बढ़ा देता।
अब क्या करेगा विपक्ष?
विपक्षी गठबंधन के नेताओं को समय का इंतजार है। उन्होंने सरकार बनाने के लिए एनडीए के पाले में गेंद डाल दी है। टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू लौटकर आंध्र प्रदेश जा रहे थे तो हवाई अड्डे पर उनकी मुलाकात तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से हुई थी। स्टालिन और नायडू में औपचारिक दुआ-सलाम के बाद सौहार्दपूर्ण बातचीत हुई। एमके स्टालिन बड़े सुलझे नेता हैं। पिता एम करुणानिधि की तरह 'हार्ड बार्गेनर' भी। चंद्रबाबू नायडू भी 'हार्ड बार्गेनर' हैं। कभी एनडीए के संयोजक भी थे। माना जा रहा है कि मिले संकेत और संदेश को एमके स्टालिन ने भी पढ़ा। चंद्रबाबू नायडू ने भी पढ़ा और समझा।
ऐसा माना जा रहा है कि विपक्षी गठबंधन की निगाह अब 18वीं संसद के गठन और पूर्णकालिक बजट पेश होने के बाद की स्थितियों पर है। सही समय का इंतजार है। समझा जा रहा है कि राजनीतिक रूप से उपयुक्त समय देखकर यह गठबंधन संसद में सरकार के कामकाज के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर अपने मंसूबे को पूरे करने की योजना पर काम कर सकता है। इससे पहले गठबंधन का मुख्य जोर अपने साथियों की संख्या बनाए रखने, एकजुटता रखने, तालमेल पर जोर देने, सरकार को घेरने में साथ देने और नए सहयोगियों की संख्या बढ़ाने के प्रयास पर रह सकता है।
नेता प्रतिपक्ष: इस बार मनमानी नहीं चलेगी
अभी तक कांग्रेस के पास मुख्य विपक्षी दल का दर्जा था। संविधान मामलों के विशेषज्ञ बीएनपी पाठक कहते हैं कि मुख्य विपक्षी दल तो एक व्यवस्था थी, जबकि लोकसभा या राज्यसभा में नेता विपक्ष की एक हैसियत होती है। संवैधानिक मर्यादा और संसदीय कानून में प्रदत्त शक्ति भी। कैबिनेट मंत्री का दर्जा होता है। इसी के अनुरुप वेतन, भत्ता, सुविधा भी मिलती हैं। पाठक का कहना है कि नेता विपक्ष का पद संविधान में नहीं है। यह संसद के नियम (संसद संविधि) के अनुसार है। नेता विपक्ष के पास सरकार की नीतियों, कामकाज का रचनात्मक विरोध का अधिकार होता है और संसद में एक वैकल्पिक स्थिति प्रदान करता है।
संसद के दोनों सदनों में नेता विपक्ष को यह मान्यता 1977 में दी गई थी। संविधान विशेषज्ञ के अनुसार संसद संविधि के अनुसार इस बार कांग्रेस और विपक्ष की बल्ले-बल्ले है। विपक्ष के पास विपक्ष के नेता पद का अधिकार होगा। वह सरकार पर विपक्ष के नेता की हैसियत से दबाव बना सकेगा। विपक्षी खेमे में भी संख्या ठीक-ठाक है। संख्या बल के जरिए विपक्ष अपनी बात को मजबूती से रख सकेगा।