सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ जजों की ओर से मुख्य न्यायाधिश के खिलाफ उठाए गए सवालों के बाद से देश की सियासत में फैली आग से केंद्र सरकार अपने आप को बचाएं रखना चाहती है। इसलिए रणनीति के तहत सरकार ने अपने आप को मामले में बयानबाजी तक से दूर रखा है। सरकार के वरिष्ठ सूत्रों की ओर से दिन भर सिर्फ इसी बात के संकेत दिए जाते रहे कि मामला न्यायपालिका के अंदरूनी झगड़े का है। सरकार इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। संकट का सामधान खुद न्यायपालिक निकालेगी। बल्कि विधि राज्य मंत्री पीपी चौधरी को अपने वरिष्ठ मंत्री रविशंकर प्रसाद से मीडिया में बयानबाजी पर फटकार भी खानी पड़ी है। सूत्र बताते हैं कि रविशंकर ने फोन कर चौधरी को नसीहत दी है कि वे मामले पर कोई बयानबाजी न करें। चौधरी ने एक अंग्रेजी चैनल को बयान दे दिया था जो कि सरकार को नगावार गुजरा है।
पीएमओ से संचालित हो रही सरकार की रणनीति
चार न्यायधिशों के जरिए
मुख्य न्यायाधिश के साथ देश के लोकतंत्र पर सवाल उठाए जाने के बाद उपजे हालातों से निपटने के लिए सरकार की पूरी रणनीति सीधे
प्रधानमंत्री कार्यालय से तय हो रही है। चार जजों की पत्रकार वार्ता के बाद पीएम ने कानून मंत्री को तलब कर उनसे स्थिति पर चर्चा की। सरकार ने रणनीति बनाई है कि मामले पर उसकी ओर से अभी कोई बयानबाजी नहीं होगी। मामले को न्यायपालिक का मामला बताकर सरकार इससे होने वाले सियासी बवाल को टालना चाहती है। कॉलेजियम के मामले में पहले ही सरकार न्यायपालिका का विरोध झेल चुकी है। अब चुनावी वर्ष में वे न्यायपालिका के साथ टकराव का संकेत देने के मूड में नहीं है। वैसे भी जजों ने मुख्य न्यायाधिश पर सवाल उठाने के साथ देश के लोकतंत्र पर खतरा करार दिया है।
कानून मंत्रालय में बढ़ी रही मीडिया की गतिविधि
जजों के सवाल के बाद देश में मचे बवाल पर विपक्ष ने जहां सीधे सरकार पर हमला बोला है। वहीं लोकतंत्र पर सवाल उठाए जाने को लेकर सरकार के रणनीतिकार भी सकते में है। पार्टी मुख्यालय से लेकर पार्टी के तमाम नेता कोई बयान देने के बजाय चैनलों के जरिए ही मामले पर अपडेट लेते रहे। दिनभर मीडिया की गतिविधि कानून मंत्रालय में बढ़ी रही। मगर सरकार के मामले में मौन रहने की रणनीति की वजह से किसी को कुछ खास हाथ नहीं लगा। देर शाम इंतजार के बाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद कार्यालय में पहुंचे भी तो उन्होंने अनौपचारिक चर्चा तक ही अपने आप को सीमित रखा।