वहीं ये कानून ऐसे लोगों को बचा रहा था जिनका जबरन धर्मपरिवर्तन करवाया जा रहा था। लेकिन कई मामलों में ईसाई मिशनरी लोगों को प्रलोभन देकर या अपनी बातों में फंसाकर उनका धर्म परिवर्तन करवा रहे थे। जिसके बाद लोगों का कहना था कि वह ये सब वह अपनी मर्जी से कर रहे हैं और ये कानून भी उन मिशनरियों के आगे ढाल बन रहा था। लेकिन यदि यह खत्म हो जाएगा तो यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म का प्रचार कर या फिर लोगों को प्रलोभन देकर उनका धर्म परिवर्तन कराएगा तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
आंकड़ों की मानें तो राज्य में ईसाई धर्म में धर्मांतरण की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 1951 की जनगणना बताती है कि राज्य में उस वक्त एक भी ईसाई नहीं था। ये आंकड़े 2001 की जनगणना में पूरी तरह बदल गए और हिंदुओं के बाद ईसाई तीसरा सबसे बड़ा धार्मिक समूह बन गया। 2001 में राज्य में ईसाइयों की संख्या राज्य की कुल संख्या का 18.7 फीसदी थी। इसके बाद 2011 की जनगणना में इस धर्म में और भी तेजी से बढ़ोतरी हुई। इसके बाद ईसाइयों की संख्या कुल जनसंख्या का 30.26 फीसदी हो गई और हिंदुओं की संख्या 29.04 फीसदी हो गई।
अब ईसाई धर्म मुख्य समूह के रूप में उभरता जा रहा है। ईसाई मिशनरियों का प्रभाव सबसे ज्यादा स्वदेशी जनजातियों पर पड़ रहा है। जो सबसे ज्यादा संख्या में ईसाई धर्म में शामिल हुए हैं। रूपांतरण ब्रिगेड ने अपना काम तब भी जारी रखा जब राज्य में 1978 में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हुआ था। राज्य में धर्मनिरपेक्षता बनाए रखने के लिए सरकार के लिए ये कदम उठाना अब आवश्यक बन चुका है।