चूंकि उस समय वह चेन्नई के क्वीन मेरीज कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं तभी उनकी मुलाकात सरोजिनी नायडू की छोटी बहन से हुई और उन्होंने भाई हरेंद्र नाथ से मुलाकात कराई और उन दोनों में दोस्ती हुई फिर बाद में दोनों ने शादी कर ली। विधवा विवाह और जाति-बिरादरी से अलग विवाह करने की वजह से वे आलोचना की शिकार भी हुईं लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की।
इसके अलावा कमलादेवी ने लंदन यूनिवर्सिटी के बेडफोर्ड कॉलेज से समाजशास्त्र की पढ़ाई भी की। साथ ही कमलादेवी ने भारतीय पारंपरिक संस्कृत ड्रामा कुटीयाअट्टम का भी गहन अध्ययन किया। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं जैसे- -द अवेकिंग ऑफ इंडियन विमेन, जापान इट्स विकनेस एंड स्ट्रेंथ, अंकल सैम अंपायर-इन वार-टर्न चाइना-टुवर्डस ए नेशन थियेटर। फिर वह पति के साथ विदेश चली गईं लेकिन जब उन्हें 1923 में असहयोग आंदोलन के बार में पता चला तो वह भारत आ गईं और आजादी की लड़ाई में जमकर काम किया।
कमलादेवी ने फिल्मों में भी अपनी किस्मत आजमाई। उन्होंने दो मूक फिल्मों में काम किया। इसमें से एक कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री की पहली साइलेंट फिल्म थी। फिल्म का नाम था 'मृच्छकटिका (1931)।' इसके बाद वे एक बार फिल्मों में नजर आईं। वे 'तानसेन' फिल्म में के.एल. सहगल और खुर्शीद के साथ नजर आईं। उसके बाद कमलादेवी ने 'शंकर पार्वती (1943)' और 'धन्ना भगत (1945)' जैसी फिल्में भी की।