दिवाली की रात तैयार की थी पिता ने यह तस्वीर
हम भाई बहन भी घर के आंगन को रंगोली और दियों से सजाने की तैयारी कर रहे थे। दिवाली का एक अजीब ही उत्साह होता है। मैंने झटपट मां की नई वाली साड़ी पहन ली थी। उसके बाद पीतल का बड़ा दीया जिसे महाराष्ट्र में समई कहा जाता है, जलाकर उसे ले जा रही थी, तभी पिताजी ने मुझे देख लिया।
उन्होंने मेरी साड़ी ठीक की और कहा- कुछ देर रुको, तुम्हारी तस्वीर बनानी है। फिर उन्होंने मुझे पोज बनाने के लिए कहा और करीब साढ़े तीन घंटे तक स्केच तैयार करते रहे। तीन दिन बाद जब यह पेंटिंग पूरी तरह तैयार हुई तो मेरी आंखें अपनी तस्वीर को निहारती ही रहीं। मन ही नहीं भर रहा था।' उस समय मैं 29 साल की थी।
गीता ने अपने इस इंटरव्यू में बताया था कि लोग सालों तक इस पेंटिंग को राजा रवि वर्मा की पेंटिंग समझते रहे जबकि इस पेंटिंग की लड़की मैं हूं और इसे बनाने वाले मेरे पिता एसएस हलणकर। खुद गीता को पेंटिंग की काफी बारीकियां पता थीं।
उन्होंने बताया कि इस फोटो को रवि वर्मा की फोटो बताए जाने का कारण साड़ी की वो सिलवट है, उसका टैक्स्चर काफी कुछ रवि वर्मा की शैली से मिलता-जुलता था। इसी भ्रम में कई लोगों ने मुझसे इस पेंटिंग को लेकर पूछताछ की थी। उन्होंने बताया था कि उनके पिता और वर्माजी की शैली करीब-करीब एक जैसी ही थी।