वैश्विक स्तर पर जिस तरह से लकड़ी की मांग बढ़ रही है उस हिसाब से आने वाले दशकों में इससे होने वाला वार्षिक उत्सर्जन बढ़कर 420 करोड़ टन पहुंच जाएगा। यह हाल के वर्षों में होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड के कुल वैश्विक उत्सर्जन से दस फीसदी ज्यादा है। वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (डब्ल्यूआरआई) एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह तथ्य उजागर किया है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, उत्सर्जन का यह स्तर विमानन उद्योग से हर साल होने वाले उत्सर्जन का तीन गुना ज्यादा है। ‘द कार्बन कॉस्ट्स ऑफ ग्लोबल वुड हार्वेस्ट्स’ नामक यह अध्ययन भारी पैमाने पर होने वाले इस उत्सर्जन को बहुत गंभीर श्रेणी में रखता है। दूसरी ओर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट (आईआईईडी) के शोध के मुताबिक यदि अफ्रीका की आधी नई इमारतों में स्टील और कंक्रीट के बजाय लकड़ी का इस्तेमाल किया जाए तो उससे निर्माण क्षेत्र से होने वाले शुद्ध उत्सर्जन में 2050 तक पांच से दस गीगाटन की कमी की जा सकती है।
शोध के अनुसार, 2050 तक लकड़ी की वैश्विक मांग 54 फीसदी तक बढ़ सकती है, जो 2010 में 370 करोड़ क्यूबिक मीटर से बढ़कर 570 करोड़ क्यूबिक मीटर पर पहुंच जाएगी। शोध के अनुसार उत्सर्जन को कम करने के लिए लकड़ी का उपयोग कम कर पौधरोपण की मौजूदा दर में वृद्धि करनी होगी।