बतौर प्रभा, पहले खुद स्वीकार करूंगी कि मेरे साथ ऐसा हुआ है। मैं ठीक होकर दिखाऊंगी। इसके बाद मेरा मकसद है दूसरों की मदद करना। यानी मेरी तरह ही जो लोग आग के शिकार हुए हैं, उन्हें हर तरीके से जीवन में आगे ले जाने का प्रयास करूंगी। हालांकि मैंने अपनी मुहिम शुरू भी कर दी है। फिलहाल सोशल मीडिया पर मैं अपने लक्ष्य को आगे बढ़ा रही हूं।
दूसरे पीड़ित लोगों की समस्याएं क्या हैं, सामाजिक तौर पर उन्हें क्या झेलना पड़ रहा है, आदि बातों की जानकारी लेकर उनकी दिक्कतों का हल निकालने का प्रयास करेंगे। मैं उनके साथ अपनी स्टोरी शेयर कर रही हूं। पेरेंट्स ने कहा था कि जले हुए हाथ पर कपड़ा बांध कर रखो, लेकिन मैंने मना कर दिया। मैंने कहा, आप उस सच को छिपाने के लिए कह रहे हैं, जिसे दुनिया छिपाने पर मजबूर करती है। हरगिज नहीं, मैं ऐसे ही लोगों के बीच आऊंगी। इससे मुझे ही नहीं, बल्कि दूसरों में भी सच का सामना करने का कितना साहस है, पता चलेगा।
शीबा जब यूपी के बदायूं में रहती थी तो उसके साथ बड़ा हादसा हो गया। उसके मुताबिक, मिट्टी के तेल से भरा लैंप मेरे उपर गिर गया था। उस वक्त मेरी उम्र करीब दस साल रही होगी। चेहरे से लेकर पेट तक का हिस्सा जल चुका था। परिवार को छोड़ दें तो बाकी लोग धीरे-धीरे किनारा करने लगे थे। सातवीं कक्षा में स्कूल छूट गया।
एक बार तो ऐसा भी लगा, जैसे कि कोई साथ ही नहीं दे रहा है। अब शादी में भी दिक्कत आ रही है। देखने वाले आते हैं, चेहरे की ओर निहारते हैं और बाद में बिना कोई जवाब दिए चुपके से निकल जाते हैं। दो साल अस्पताल में रहने और उसके बाद घर पर भी करीब सात वर्ष इलाज चला। चार भाई और चार बहनें, इन्हें भी तो देखना है। अब ऐसे में कोई प्लास्टिक सर्जरी की सोचे भी तो कैसे सोचे।
डॉ. राजीव बी आहूजा का कहना है कि विदेशों में स्किन बैंक खुलने लगे हैं, लेकिन भारत में अभी यह लोगों के लिए एक कौतूहल का विषय बना है। कोई भी इस तरफ देखना या सोचना पसंद नहीं कर रहा है।
सरकार की ओर से लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए कुछ नहीं हो रहा है। हमारे देश में चेहरे की सर्जरी करानी है तो कम से कम 25-30 लाख रुपये लग जाते हैं। यह इलाज सबके वश में नहीं है।इसके लिए सरकार और बड़े औद्योगिक घरानों को आगे आने होगा।वे अत्याधुनिक अस्पताल बनवाएं या फिर वर्तमान अस्पतालों में प्लास्टिक सर्जरी जैसे इलाज को सस्ता करा दें।