अपनी आबादी में रोग की प्रकृति समझने के मामले में भारत अब दुनिया की चौथी शक्ति बना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत की विशालता और विविधता सिर्फ खानपान, बोलचाल या फिर भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। भारत में रहने वालों के जींस में भी काफी विविधता हैं और स्वाभाविक रूप से बीमारियों की प्रकृति में भी यह दिखाई देते हैं। इसलिए कौन से व्यक्ति को किस प्रकार की दवा फायदा देगी? यह जानने के लिए भारत को अब जीनोम इंडिया डाटा मिल गया है।
बृहस्पतिवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित जीनोम डाटा कॉन्क्लेव में वीडियो संदेश के जरिए प्रधानमंत्री ने कहा कि देशवासियों को उसकी जेनेटिक पहचान पता होना जरूरी है। उदाहरण के लिए हमारे आदिवासी क्षेत्र में सिकलसेल की बीमारी एक बड़ा संकट है। इससे निपटने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय मिशन चलाया है लेकिन इसमें भी चुनौतियां कम नहीं है। संभव है कि सिकलसेल की यह समस्या किसी एक क्षेत्र के आदिवासी समाज में हो लेकिन दूसरे क्षेत्र के उसी आदिवासी समाज में न भी हो। इसका सटीक पता तब चलेगा जब हमारे पास संपूर्ण जेनेटिक अध्ययन हो। जनवरी 2020 में शुरू इस जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट के तहत भारत के 83 समुदाय के 10 हजार लोगों के नमूने लेकर जीनोम अनुक्रमण किया है।
जांच में वैज्ञानिकों को 10 हजार लोगों के जीनोम में 13 करोड़ से ज्यादा वेरिएंट मिले हैं जिनमें 5.31 करोड़ ऐसे वेरिएंट हैं जिनमें वंशानुगत गुणों को प्रभावित करने वाले जेनेटिक तत्व शामिल हैं। केंद्र सरकार के विज्ञान एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने अब इस जीनोम डाटा को इंडियन बायोलॉजिकल डाटा सेंटर में उपलब्ध कराया है। जीनोम कॉन्क्लेव में इसे भारत सहित पूरी दुनिया के वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं के लिए सार्वजनिक किया गया। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि करीब 237 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट ने भारत में जीनोम विज्ञान को एक अहम पड़ाव दिया है।
10 लाख लोगों का लक्ष्य भी होगा पूरा
कॉन्क्लेव के दौरान विशेषज्ञों ने सरकार से इस जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट को विस्तार देने की मांग की है। इस पर भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. अजय कुमार सूद ने उम्मीद जताई है कि आगामी दिनों में यह प्रोजेक्ट पूरे विस्तार के साथ भारत के दूसरे समुदायों तक पहुंच बनाएगा। भारत में इस समय 4600 से ज्यादा समुदाय हैं उन्हें शामिल करने के लिए कम से कम 10 लाख जीनोम डाटा एकत्रित करने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
कई मार्कर का पता चला, जो हृदय गति से संबंधित
कॉन्क्लेव में जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव राजेश गोखले ने बताया कि भारत की आबादी का यह आनुवंशिक डाटा एक बड़ी सफलता है। पिछले कई दशकों से भारत में वैज्ञानिक इस डाटा का इंतजार कर रहे थे। अभी जीनोम अनुक्रमण के दौरान कई ऐसे मार्कर मिले हैं जिनके बारे में हमें पहले नहीं पता था। इसमें प्रारंभिक हृदय गति रुकने से जुड़े एमवाईबीपीसी3 जैसे उत्परिवर्तन मिले हैं जो वैश्विक स्तर की तुलना में स्थानीय स्तर पर अधिक प्रचलित हैं।