हाईकोर्ट ने कहा है कि जेनेटिक बीमारियों से पीड़ित लोगों को बीमा से बाहर रखने संबंधी नियम भेदभावपूर्ण हैं और भारतीय बीमा विनियामक व विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) को इसे हटाने पर विचार करना चाहिए ताकि हृदय, रक्तचाप व मधुमेह पीड़ित लोगों के बीमे के दावे खारिज न हों।
हाईकोर्ट ने संबंधित याचिका पर आईआरडीए को दिया निर्देश
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह ने फैसले में कहा कि बीमा का लाभ लेना संविधान में दिए गए स्वास्थ्य व स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार का अभिन्न भाग है। जेनेटिक बीमारी से पीड़ित शख्स को बीमा समझौते से बाहर करना भेदभाव पूर्ण, लोक नीति व संविधान के खिलाफ है। इस नियम के कारण बीमा लेने का पूरा मकसद ही खत्म हो जाता है।
कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में विधायिका को निर्णय लेना चाहिए ताकि ऐसे लोगों को बीमे का लाभ मिल सके। हालांकि बीमा कंपनियों को तार्किक तथ्यों के आधार पर समझौते बनाने का अधिकार है लेकिन यह मनमाने तरीके व जेनेटिक बीमारियों से पीड़ित लोगों को अलग थलग करके नहीं बनाए जाने चाहिए।
कोर्ट ने यह फैसला जयप्रकाश तायल बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के मामले में सुनाया है। तायल एक तरह की जेनेटिक बीमारी हाइपरट्रोफिक ऑब्सट्रक्टिव कार्डियोमायोपैथी से पीड़ित हैं।
इस आधार पर बीमा कंपनी ने उसे बीमे का लाभ देने से इनकार कर दिया था कि वह जेनेटिक बीमारी से पीड़ित है और ऐसी बीमारियों को बीमे में कवर नहीं किया जा सकता। निचली अदालत ने तायल के पक्ष में फैसला सुनाया था जिसे बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।